अहिल्याबाई होल्कर
| महारानी अहिल्याबाई होळकर (महाराणी अहिल्याबाई होळकर) | |
|---|---|
| [[File: मालवा साम्राज्य, इन्दौर की महाराणी अहिल्याबाई होळकर की दिल्ली के महाराष्ट्र सदन मा स्थित मुख प्रतिमा | |
| जनम | 31 May 1725 गाँव चौंढी, जामखेड, अहमदनगर, महाराष्ट्र, भारत |
| उपाधि | पुण्यश्लोक |
| अग्रज | माळेराव होल्कर |
| उत्तराधिकारी | तुकोजीराव होल्कर 1 |
| धरम | हिन्दू |
| जिवनसाथी | खण्डेराव होळकर |
अहिल्याबाई होळकर (31 मई 1725-13 अगस्त 1795), मराठा साम्राज्य की मशहूर महारानी रहीं अउर इतिहास-प्रसिद्ध सूबेदार मल्हारराव होलकर के पुत्र खण्डेराव की धर्मपत्नी रहीं। माहेश्वर का राजधानी बनाय के शासन करीन।
अहिल्याबाई ने अपने राज्य की सीमाओं के बाहर पूरे भारत के मशहूर तीर्थन अउर जगहन मा मंदिर बनवाए, घाट बँधवाए, कुओं अउर बावड़ियन का निर्माण करवाया, रास्ता बनवाए — काशी विश्वनाथ मा शिवलिंग स्थापित करवाया, भूखन खातिर अन्नसत्र (अन्न क्षेत्र) खोले, पियासन खातिर प्याऊ बैठवाईं, मंदिरन मा विद्वानन की नियुक्ति शास्त्रन के मनन-चिंतन अउर प्रवचन खातिर करीं।
जीवन परिचय
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]अहिल्याबाई होळकर का जनम मराठा हिन्दू परिवार मा चौंडी नाम के गाँव मा भा रहा, जौन आजकल महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले मा पड़त हय। दस-बारह बरिस की उमर मा उनकी शादी भई। उनतीस बरिस की उमर मा ऊ विधवा हुइ गईं। पति का स्वभाव चंचल अउर उग्र रहा| ऊ सब उन्होंने सहा।
फिर जब ऊ बयालीस-तैंतालीस बरिस की रहीं, पुत्र मालेराव का देहांत हुइ गा। जब अहिल्याबाई की उमर बासठ बरिस के लगभग रही, दौहित्र नत्थू चल बसा। चार बरिस बाद दामाद यशवन्तराव फणसे न रहे अउर उनकी पुत्री मुक्ताबाई सती हुइ गईं।
दूर के रिश्तेदार तुकोजीराव के पुत्र मल्हारराव से उनका बहुत स्नेह रहा| सोचत रहीं कि आगे चलिके यहई शासन, व्यवस्था, न्याय अउर प्रजारंजन की डोर संभारी; लेकिन ऊ अंत तक उन्हका दुःख देत रहा।[१]
योगदान
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अहिल्याबाई होळकर ने अपने राज्य की सीमाओं के बाहर पूरे भारत के मशहूर तीर्थन अउर जगहन मा मंदिर बनवाए, घाट बँधवाए, कुओं अउर बावड़ियन का निर्माण करवाया, रास्ता बनवाए-सुधरवाए, भूखन खातिर अन्नसत्र (अन्यक्षेत्र) खोले, पियासन खातिर प्याऊ बैठवाईं, मंदिरन मा विद्वानन की नियुक्ति शास्त्रन के मनन-चिंतन अउर प्रवचन खातिर करीं।
अउर, आत्म-प्रतिष्ठा के झूठे मोह का त्याग कइके सदा न्याय करे का प्रयास करत रहीं मरत दम तक।
ऊ उहै परम्परा मा रहीं जेमा उनके समकालीन पूना के न्यायाधीश रामशास्त्री रहे अउर उनके बाद झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई भईं। अपने जीवनकाल मा ही जनता उन्हका "देवी" समझे अउर कहे लागि रही।
जब चारों ओर भगदड़ मची रही, शासन अउर व्यवस्था के नाव पर घोर अत्याचार हुइ रहे रहे, प्रजाजन-साधारण गृहस्थ, किसान, मजदूर- अत्यन्त हीन अवस्था मा सिसकत रहे।
उनके मुख्य योगदानन मा से एक 12 ज्योतिर्लिंगन मा सोमनाथ मंदिर हय जेकर जीर्णोद्धार महारानी अहिल्याबाई होलकर ने करवाया, साथे बनारस का काशी विश्वनाथ मंदिर भी उन्हई की देन हय। इस तरह उन्होंने देश की तरक्की मा खास योगदान दीन।
साथे ही महिलाओं का शिक्षा का हक दिलाया अउर महिला सशक्तिकरण खातिर जिनगी भर प्रयास करत रहीं।[२]
इन्दौर मा हर बरिस भाद्रपद कृष्णा चतुर्दशी के दिन अहिल्योत्सव होत चला आवत हय।
अहिल्याबाई होळकर जब 6 महीना खातिर पूरे भारत की यात्रा पर गईं तो खरगोन जिले के गाँव उबदी के पास स्थित कस्बे अकावल्या के स्व. पंढरी जी पाटीदार (बावड़ीवाला) के पूर्वज का राजकाज सौंपि गईं।
उनके राज्य संचालन से खुश होइके अहिल्याबाई होळकर ने आधा राज्य देय का कहा, लेकिन उन्होंने बस इहै माँगा कि महेश्वर मा उनके समाज के लोग अगर मुर्दन का जलावे आयँ तो कपड़न समेत जलावयँ| काहे कि आसपास के गाँव के लोग जब नर्मदा तट पर शवन का लइ जात रहे तो वहाँ के लोग कपड़ा निकालि लेत रहे।
मतभेद
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]उनके मंदिर-निर्माण अउर अन्य धर्म-कामन के महत्त्व के बारे मा मतभेद हय।[३]
इन कामन मा अहिल्याबाई ने अन्धाधुन्ध खर्च करीन अउर सेना नए ढँग पर संगठित नाहीं करीन-कहीं-कहीं इहो आरोप हय।[४]
तुकोजीराव होळकर के पास बारह लाख रुपया रहे जब ऊ अहिल्याबाई होळकर से रुपया की माँग पर माँग करत रहे अउर संसार का दिखावत रहे कि रुपया-पैसा से तंग हउँ। फिर एमा अहिल्याबाई का का दोष रहा?[५]
हिन्दुओं खातिर धर्म की भावना सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति रही हय- अहिल्याबाई होळकर ने उहई का उपयोग करीन।
विचारधाराएँ
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]अहिल्याबाई होळकर के बारे मा दुइ तरह की विचारधाराएँ रही हयँ। एक मा उन्हका देवी के अवतार की पदवी दीन गई हय, दूसरी मा उनके अति उत्कृष्ट गुणन के साथे अन्धविश्वासन अउर रूढ़ियन के प्रति श्रद्धा का भी जाहिर कीन गा हय।
ऊ अँधेरे मा रोशनी की किरण की तरह रहीं, जेका अँधेरा बार-बार ग्रसे की कोशिश करत रहा। अपने उत्कृष्ट विचारन अउर नैतिक आचरण की वजह से समाज मा उन्हका देवी का दर्जा मिला।
सेनापति के रूप मा
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]मल्हारराव के भाई-बंदन मा तुकोजीराव होल्कर एक भरोसेमंद नौजवान रहे। मल्हारराव ने उन्हका हमेशा अपने साथ रखा रहा अउर राजकाज खातिर तैयार कइ लीन रहा।
अहिल्याबाई होळकर ने उन्हका अपना सेनापति बनाया अउर चौथ वसूल करे का काम उन्हका सौंपि दीन। वैसे तो उमर मा तुकोजीराव होल्कर अहिल्याबाई से बड़े रहे, लेकिन तुकोजी उन्हका अपनी माई की तरह मानत रहे अउर राज्य का काम पूरी लगन अउर सच्चाई से करत रहे।
अहिल्याबाई का उन पर इतना प्रेम अउर भरोसा रहा कि ऊ भी उन्हका पुत्र की तरह मानत रहीं। राज्य के कागजन मा जहाँ कहीं उनका जिक्र आवत हय, वहाँ अउर मुहरन मा भी 'खण्डोजी सुत तुकोजी होळकर'-इस तरह कहा गा हय।
मृत्यु
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]राज्य की चिंता का बोझ अउर ओपर से प्रानन से भी प्यारे लोगन का वियोग- इ सारे शोक-भार का अहिल्याबाई का शरीर अधिक नाहीं संभाल सका।
अउर 13 अगस्त सन् 1795 का उनकी जीवन-लीला समाप्त हुइ गई। अहिल्याबाई के निधन के बाद महाराजा तुकोजी राव ने राज्य की शासन व्यवस्था का संभारा।
देश मा स्थान
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आजाद भारत मा अहिल्याबाई होळकर का नाव बहुत सम्मान से लीन जात हय। उनके बारे मा अलग-अलग राज्यन की पाठ्य पुस्तकन मा अध्याय मौजूद हयँ।
चूँकि अहिल्याबाई होळकर एक ऐसी महारानी के रूप मा जानी जात हयँ, जिन्होंने भारत के अलग-अलग राज्यन मा मानवता की भलाई खातिर बहुत काम करीन| इसलिए भारत सरकार अउर अलग-अलग राज्यन की सरकारन ने उनकी प्रतिमाएँ बनवाई हयँ अउर उनके नाव से कई कल्याणकारी योजनाएँ भी चलावी जात हयँ।
इ योजना के तहत उत्तराखंड के बेरोजगार, बीपीएल राशनकार्ड धारकन, महिलाओं अउर आर्थिक रूप से कमजोर लोगन का बकरी पालन यूनिट के निर्माण खातिर भारी अनुदान राशि दीन जात हय।
लगभग 1,00,000 रुपया की इ यूनिट के निर्माण खातिर सरकार की ओर से 91,770 रुपया सरकारी सहायता के रूप मा अहिल्याबाई होळकर योजना के लाभार्थी का मिलत हयँ।
दिनांक 4 जनवरी 2026 का देवी अहिल्या उत्कृष्ट विद्यालय खरगोन क्रमांक 1 मा भूतपूर्व छात्रन द्वारा शताब्दी वर्ष मनावा गा। स्कूल परिसर मा देवी अहिल्याबाई की मूर्ति का अनावरण उन्हीं के वंशज द्वारा भूतपूर्व छात्रन की मौजूदगी मा कीन गा।
स्रोत
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]- मल्हार (तुकोजी का पुत्र) विषयक घटनाओं के आधार —
- 'इतिहासाचीं साधनें' मा, पत्र क्र. 260, ता. 8-12-1789
- तुकोजी का पत्र अहिल्याबाई का, क्र. 168, ता. 3-2-1790
- रुक्माबाई का पत्र अहिल्याबाई का, क्र. 268, ता. 3-2-1790
- अहिल्याबाई का पत्र तुकोजी का, क्र. 273, ता. 1-4-1790
- यशवंतराव गंगाधर का पत्र अहिल्याबाई का, ता. 2-4-1790
- रुक्मबाई का पत्र अहिल्याबाई का, क्र. 277, ता. 16-4-1790
- मल्हार का पत्र अहिल्याबाई का, क्र. 279, ता. 5-5-1790
- सरदेसाई कृत 'New History of the Marathas', Vol. III
- सरदेसाई कृत 'The Main Currents of Maratha History'
- V.V. Thakur कृत 'Life and Life-work of Shri Ahilya Bai'
- डॉक्टर उदयभानु कृत 'देवी अहिल्याबाई' (हिंदी)
- 'देवी श्री अहिल्याबाई होलकर' (मराठी)
- 'पुण्यश्लोक देवी श्री अहिल्याबाई' (मराठी)
- 'होलकरांची कैफियत'
- इंदौर गजीटियर
बाहरी कड़ियाँ
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]| Hindi विकिस्रोत पर इस लेख से संबंधित मूल पाठ उपलब्ध है: |
इहो देखा जाय
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]सन्दर्भ
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]- ↑ खाँचा:Cite wikisource
- ↑ त्रिपाठी, अभिषेक (गरमी २०२५). "पुण्यश्लोक महारानी अहिल्याबाई होलकर जी की 300वीं जन्मवर्ष के अवसर पर एक भेंट". BJPAURAIYASM.
{{cite journal}}: CS1 maint: date auto-translated (कड़ी) - ↑ श्री सरदेसाई ने अपने ग्रन्थ 'New History of the Marathas', Vol. III p. 211 पर लिखा हय कि इन कामन मा अहिल्याबाई ने अन्धाधुन्ध खर्च करीन अउर सेना नए ढँग पर संगठित नाहीं करीन। तुकोजी होलकर की सेना का उत्तरी अभियानन मा अर्थसंकट सहना पड़ा।
- ↑ श्री सरदेसाई ने अपनी नवीनतम पुस्तक 'The Main Currents of Maratha History' मा इन मंदिरन का हिन्दू धर्म की बाहरी चौकियाँ बतलाया हय।
- ↑ इतिहास लेखकन का कहना हय कि Religion has been the greatest motive power for the Hindus।
