सामग्री पर जाएँ

दीपाली बरठाकुर

विकिपीडिया से
दीपाली बरठाकुर
जनम30 January 1941
निलोमोनी टी एस्टेट, सोनारी, शिवसागर, असम
मौत21 दिसंबर 2018
गुवाहाटी
रोजगारगायक
कार्यकाल1955-1969
जिवनसाथीनील पवन बरुआ
पुरस्कारपद्मश्री, 1998

दिपाली बारठाकुर[] (30 जनवरी 1941 - 21 दिसंबर 2018) असम कय एक भारतीय गायिका रहीं। उनके गीत मुख्य रूप से असमिया भाषा मा गावा जात रहें।[] उनका भारत का चौथा सबसे बड़ा नागरिक पुरस्कार, पद्मश्री, वर्ष 1998 मा मिला।[]

बार्थकुर[] का जनम 1941 मा बिष्वनाथ बोर्थकुर अऊर चंद्रकांती देवी के घरे असम के सिवासागर मा सोनारी मा भवा रहा।[][]

बार्थकुर ने एक गायिका के रूप मा आपन करियर जल्दी शुरू किहिन। कक्षा नौ मा पढ़त रहीं, 1958 मा अखिल भारतीय रेडियो, गुवाहाटी मा "मोर बोपाई लाहौरी" अउर फिल्म लचित बोरफुकन (1959) खातिर "जौबोने अमोनी कोरे चेनाइधों" गीत गाइन।[]

उनके कुछ अन्य लोकप्रिय असमिया गीत हैं:[]

  • "सोनोर खारु नालागे मुक"
  • "जौबोने आमोनी कोरे, चेनइधों"
  • "जुंधोने जुनालाइट"
  • "कोनमाना बोरोक्सिरे सिप"
  • "सेनाई मोइ जाउ देई"
  • "ओ' बोंधु सोमोई पाले अमर फले"

बार्थकुर ने 1969 मा आपन आखिरी गीत "लुइटो नेजाबी बोई" गाइन। वहिके बाद उ एक गंभीर मोटर न्यूरॉन रोग से पीड़ित होय लागिन जेहिसे ओनके गायन मा बाधा आई अऊर ओनका व्हीलचेयर का उपयोग करै का पड़ा। 1976 मा उ असम के एक प्रख्यात भारतीय कलाकार अऊर चित्रकार अऊर असम के प्रसिद्ध लेखक बिनंद चन्द्र बरुआ के बेटवा नील पवन बरुआ से बियाह किहिन।[]

लम्बी बीमारी के बाद 21 दिसम्बर 2018 का गुवाहाटी के नेमकेयर अस्पताल मा बरठाकुर कै मउत होइगै। उनका "असाम के कोयल" के रूप मा जाना जात रहा।[१०]

बार्थकुर का कई बार सम्मानित कीन गा रहा, खास तौर से 1990-92 मा लोक अऊर पारंपरिक संगीत के लिए पद्मश्री पुरस्कार से।

उनके कुछ पुरस्कार/ मान्यता नीचे सूचीबद्ध हैं:[११]

पद्मश्री (1998) का भारत सरकार द्वारा कला मा उनके योगदान के लिए। असम सरकार से सिलिपी बोटा (2010) सादौ आसोम लेखिका सोमारोह समिति द्वारा ऐदेउ हंडिक सिल्पी पुरस्कार (2012)।

वे असम की लोक और पारंपरिक संगीत में अपना अमिट योगदान छोड़ गईं। उनके गाने आज भी असमिया संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हैं।