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नोक्कुविद्या पवकाली

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रंजिनी, मूझिकल पंकजाक्षी के पोती, कासरगोड डी.टी. के कान्हंगड मा UTSAVAM2017 के मंच पर नोकुविद्यापवाकली करत अहै।

नोक्कुविद्या पावकाली या बस नोक्कुविद्या भारत के केरल से एक प्रकार का कठपुतली है। ई नाक अऊर ऊपरी होंठ के बीच मा बंधे दुइ फुट लंबा पतली छड़ी पर स्थिर छोट कठपुतली का हिला के कहानी सुनावै के एक तरीका है। यहिमा आमतौर पै रामायणमहाभारत कै कहानी देखावा जात है।

नोक्कुविद्या पावकाली एक प्रकार कय कठपुतली होय जवन भारत कय केरल मा प्रचलित होत है। ई नाक अऊर ऊपरी होंठ के बीच मा धरे एक पतली छड़ी पर तय कीन गा छोट कठपुतली का हिला के कहानी सुनावै के एक तरीका है।[]


नोक्कुविद्या केरल के वेलापाणिकर समुदाय द्वारा प्रस्तुत कीन जाय वाली एक लोक कला है।[] ईका मूल रूप से ओणमथुलाल कहा जात रहा काहे से कि ई ओणम के दिनन मा कीन जात रहा। एक नोकुविद्या कठपुतली शो आमतौर पर रामायण से कहानियन का दर्शावत है, जइसे कि राम अऊर रावण के लड़ाई अऊर सीता के वापसी। महाभारत से कहानी भी प्रस्तुत कीन जात हैं।[]

मिथकन के अनुसार, अतीत मा शिव अऊर पार्वती कुरावन अऊर कुराठी (वेलन अऊर वेलठी) के रूप मा भेष बदलत रहें। वहि समय भगवान शिव देवी पार्वती का प्रसन्न करै के ताईं यक कला रूप कै प्रस्तुति दिहिन।[] भगवान शिव ने सबसे पहिले जंगल मा एझिलमला के पेड़ से काटी गई लकड़ी से कुछ कठपुतली बना के अऊर ओकरे नीचे एक कमुक छड़ी ठीक कइके नोक्कुविद्या किहिन। अइसा माना जात है कि ई कला रूप बाद मा वेलर समुदाय के बाद के पीढ़ियन का पारित कीन गा रहा।[]

नोक्कुविद्या एक अइसन कला है जेका त्रावणकोर के राजा लोग रेशम औ चूड़ी दइके प्रोत्साहित करत रहें। ओणम के दिनन मा ई कला रूप दक्षिण केरल मा बहुत लोकप्रिय रहा। लेकिन ई कठपुतली शो, समय के साथ प्रदर्शन से गायब होइ गवा।[] बाद मा, मूझिकल पंकजाक्षी ने ई कला रूप का फिर से जनता के ध्यान मा लाया। मूझिकल पंकजाक्षी के पोती रंजिनी भी नोकुविद्या पावकाली के एक प्रसिद्ध कलाकार हैं।[]

नोक्कुविद्या के लिए कठपुतली एझिलमपाला (अल्स्टोनिया स्कॉलरिस) के लकड़ी का उकेर के बनाई जात हैं। दुइ फुट लंबा छड़ी जेहिका कठपुतली तय कीन जात है, उ कमुक (एरेका कैटेचु) के लकड़ी से बनाई जात है।[] कोयला, पत्ती के अर्क अऊर फल के रस जइसन प्राकृतिक रंग पदार्थन का रंग के रूप मा उपयोग कीन जात है।

ई कला रूप जमीन पर फैली घास के चटाई पर बइठ के कीन जात है। नोक्कुविद्या पावकाली नीलाविलक्कु प्रज्वलित कइके अऊर गणेश, सरस्वती अऊर लक्ष्मी के आशीर्वाद के प्रार्थना से शुरू होत है। फिर नाक अऊर ऊपरी होंठ के बीच मा धरे दुइ फुट लंबा लकड़ी के छड़ी पर टिका तीन दीपक (शिव के तीन आँखिन का दर्शाता है) जलावा जात है।[]

प्रारंभिक प्रार्थना के बाद कठपुतली शो शुरू होत है।[] दुइ फुट लंबा छड़ी पर तय कठपुतली तब नाक अऊर ऊपरी होंठ के बीच पकड़ के सिर के ऊपर संतुलित कीन जइहैं। कठपुतली का जोड़ै वाली तार का हाथन से धीरे-धीरे गीत अऊर कहानी के लय मा हिलावा जात है।

उपयोग कीन जाय वाली पृष्ठभूमि वाद्ययंत्र गंचिरा अऊर कैमनी हैं।[]