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श्री जगन्नाथ रथ यात्रा

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पुरी की श्री जगन्नाथ रथ यात्रा
देवताओं के तीन रथ और पृष्ठभूमि में मंदिर, पुरी
अउर नामघोष यात्रा
मनावे वालाहिन्दू
किसिमधार्मिक
महत्वमोक्ष की ओर आत्मा की यात्रा का प्रतिनिधित्व करता है
सुरुआतआषाढ़ शुक्ल द्वितीया
अंतआषाढ़ शुक्ल की दशमी
अवधि1 सप्ताह, 2 दिन
बारंबारतावार्षिक

पुरी के रथ-यात्रा (ओड़िया: ରଥଯାତ୍ରା, (/ˈrʌθə ˈjɑːtrɑː/, ओड़िया pronunciation: [ɾɔt̪ʰɔ dʒat̪ɾa]) आषाढ़ (जून-जुलाई) के सुक्ल पच्छ मा दूज के दिन हर साल निकारी जाति है। यहिका सबते पुरान अउर सबते बड़े हिंदू रथपर्व के रूप मा माना जात है।[][] भगवान जगन्नाथ ते जुड़ी या रथ-यात्रा भारत के ओडिशा राज्य के पुरी सहर मा आयोजित कीन जाति है। ई परब मा तमाम भक्त, तीनों देउतन (जगन्नाथ, उनके भइया बलभद्र अउर बहिन सुभद्रा) का तीन बड़े-बड़े लकड़ी के रथन (नंदिघोष, तालध्वज अऊर दर्पदलन) मा बड़ दाँड पर गुंडीचा मंदिर तक खींचति हैं, जहाँ उइ एकु हफ्ता तक रहति हैं औ फिर जगन्नाथ मंदिर का लौटि आवति हैं। ई वापसी जात्रा का बहुड़ा यात्रा कहा जात है।[][] गुंडीचा मंदिर ते वापस आवत समय, तीनों देउता मौसी माँ मंदिर के लगे कुछ देर के खातिर रुकति हैं अउर हुवाँ पोड़ा पीठा का भोग लगावा जात है, जउन एक खास तरह का पुआ आय, जेहिका प्रभुजी का सबते मनपसंद माना जात है। सात दिन रहै के बादि, तीनों देउता अपने अस्थान पर लौटि आवति हैं। []। वर्ष 2026 मा, जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू होई अऊर 24 जुलाई तक जारी रही।[]

रथ-यात्रा का वर्णन ब्रह्म पुरान, पद्म पुरान, स्कन्द पुरान, अउर कपिल संहिता मा पावा जात है। 13वीं सदी ते यूरोपीय यात्रिन के द्वारा ई पर्व का उल्लेख कीन गा है, जेहिमा सबते प्रमुख अउर सजीव वर्णन 17वीं सदी मा दर्ज कीन गे हैं।

जगन्नाथ, बलभद्र अउर सुभद्रा के तीनों रथ हर साल फस्सी, धौसा जइसि खास बिरवन के लकड़ी ते बनाए जाति हैं। ई रथ परंपरा के अनुसार पूर्व-रियासत दसपल्ला ते आए बढ़ई लोगन के याक खास टोली के द्वारा बनाए जाति हैं, जिनका यो काम करै का पुश्तैनी अधिकार अउर विसेषाधिकार प्राप्त है। लकड़ी के लट्ठन का पारंपरिक रूप ते महानदी मा बेड़ा बनाय कै बहावा जात है। इनका पुरी के लगे इकट्ठा कीन जात है अउर फिर सड़क के रस्ता ते हुवाँ पहुँचावा जात है। सदिन ते तय अउर मानी जा रही एक खास बिधी के अनुसार सजाए गे तीनिउ रथ बड़ दाँड पर खड़े कीन जाति हैं। मंदिर के पूरबी दुआर के लगे चौड़े रस्ता पर रथन् का एकु लाइन मा लगावा जात है, जेहिका सिंहदुआरौ कहा जात है। सब रथन के चारिहुँ ओर नौ पार्श्व देउता होति हैं, जिनका रथ के बगल मा अलग-अलग देउतन का दरसावय वाली रंगीन लकड़ी के मूरति के माध्यम ते दरसावा जात है। हर रथ मा एक सारथी अउर चारि घोड़ा होति हैं।

रथ का ब्योरा जगन्नाथ बलभद्र सुभद्रा
रथ का नाँव नंदिघोष (ନନ୍ଦିଘୋଷ) तालध्वज (ତାଳଧ୍ୱଜ) दरपदलन (ଦର୍ପଦଳନ)
रथ के अउर नाँव गरुड़ध्वज, कपिध्वज लांगलध्वज देवदलन, पद्मध्वज
छवि
Nandighosha Ratho
Chariot Nandighosha of Lord Jagannath
Lord Shri Jagannath on His Chariot Nandighosha
Taladhwaja Ratho
Debadalana Ratho
चाकरन के संख्या १६ १४ १२
उपयोग कीन गे काठे के टुकड़न के संख्या ८३२ ७६३ ५९३
ऊंचाई 44' 2" 43' 3" 42' 3"
चौड़ाई 34'6" x 34'6" 33' x 33' 31'6" x 31'6"
कनात का रंग लाल, पियर लाल, नीला, हरियर लाल, करिया
अभिभावक गरुड वासुदेव जयदुर्गा
सारथी दारुका मातलि अर्जुन
झण्डा क नाँव त्रैलोक्यमोहिनी उन्नानी नादाम्बिका
झण्डा के निशानी पाम क्यार बिरवा
घोड़ा क नाँव
  1. शंख
  2. बलाहक
  3. श्वेता
  4. हरिदाश्व
  1. तीव्रा
  2. घोरा
  3. दीर्घशर्मा
  4. स्वर्णनाभा
  1. रोचिका
  2. मचिका
  3. जिता
  4. अपराजिता
घोड़ा क रंग उजर करिया लाल
रथ के रसरी के देउता शंखचूड़ा नागिन वासुकि नाग स्वर्णचूड़ा नागिन
संगी देउता मदनमोहन रामकृष्ण सुदर्शन
द्वारपाल
  1. जया
  2. विजया
  1. नंदा
  2. सुनंदा
  1. गंगा
  2. जमुना
नौ ठईं पार्श्वदेउता
  1. पंचमुखी महावीर ( हनुमान )
  2. हरिहर
  3. मधुसूदन (विष्णु )
  4. गिरिधर ( कृष्ण )
  5. पांडु नरसिंह
  6. चितामणि कृष्ण
  7. नारायण (विष्णु )
  8. छत्रभंगरावण (राम)
  9. हनुमान के ऊपर बइठि राम
  1. गणेश
  2. कार्तिकेय
  3. सर्वमंगला
  4. प्रलाम्बरी (बलराम)
  5. हलायुध (बलराम)
  6. मृत्युंजय (शिव)
  7. नटेश्वर (शिव)
  8. मुक्तेश्वर (शिव)
  9. शेषदेव
  1. चंडी
  2. चामुंडा
  3. उग्रतारा
  4. वनदुर्गा
  5. शुलिदुर्गा
  6. वाराही
  7. श्यामाकाली
  8. मंगला
  9. विमला

[]

पर्यटन अउर धार्मिक महत्त्व

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ई अस्थान का धार्मिक महत्व जगन्नाथजी का मंदिर है। सास्त्रन औ पुराननौ मा रथ-यात्रा के महत्ता स्वीकार कीन गै है। स्कन्द पुरान मा कहा गा है कि रथ-यात्रा मा जउन मनई श्री जगन्नाथ जी के नावँ का कीर्तन करत गुंडीचा नगर तक जात है वो पुनर्जन्म ते मुक्त होइ जात है। जउन मनई श्री जगन्नाथ जी का दरसन करत, परनाम करत, रस्ता के धूरि-कीचड़ मा ल्वाटत जाति हैं उइ सीधे भगवान श्री विष्णु के उत्तम धाम का जाति हैं। जउन मनई गुंडिचा मंडप मा रथ पर विराजमान श्री कृष्ण, बलराम औ सुभद्रा देवी के दरसन दक्खिन दिसा का आवत भए करति हैं, उइ मोच्छ का प्राप्त होति हैं। रथयात्रा एक अइसन परब है जेहमा भगवान जगन्नाथ चलि कै जनता के बीच आवति हैं अउर उनके सुख-दुख मा सहभागी होति हैं। 'सब मनिसा मोर परजा' (सब मनई हमार परजा हैं), ई उनके उद्गार आहीं। भगवान जगन्नाथ तो पुरुषोत्तम हैं। उनमा श्रीराम, श्रीकृष्ण अद्वैत ब्रह्म रूप समाहित है। उनके अनेक नावँ हैं, उइ पतित पावन हैं।[]

जगन्नाथ मंदिर मा कई तरह के सेवक होति हैं जउन रथ पर अपनि सेवा देति हैं।

  • सुआरा
  • महासुआरा
  • डाहुक: रथ डाहुक बोलि (ओड़िया: ଡାହୁକ ବୋଲି, जिनका "डाहुक गीतौ" (ଡାହୁକ ଗୀତ) कहा जात है) काव्यात्मक पाठ आहीं। रथ-यात्रा प्रजनन अउर जीवन चक्र के याक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति आय, डाहुक द्वारा गाए जाय वाली ई "बोलि" मा अश्लील/फूहड़ गीत सामिल होति हैं। यहौ माना जात है कि जब तक डाहुक बोलि नहीं गावा जात है, तब तक 'रथ नहीं चलत है। ई गीत बिना कउनो रोक-टोक के खुलेआम गाए जाति हैं। डाहुक परब के समय रथ के गति का नियंत्रित कीन जात है।
  • दइता पति
  • पुस्पालक
  • बनाटी खेलाड़ी: बनाटी याक बहुत पुरान कला आय, जेहमा एकु मनई रस्सी के छोर पर बंधे आगि लगे गोला का घुमावत है। हर साल रथ-यात्रा मा भक्त भगवान जगन्नाथ का खुस करै के खातिर "बनाटी" करति हैं। बनाटी मा चाकू अउर आगि के गोला, यात्रा मा तब रंग भरि देति हैं जब वह अपनी मंजिल तक पहुँचत है।

हेरा पंचमी पुरी के जगन्नाथ मंदिर मा रथयात्रा के दौरान मनावा जाय वाला एक अनुष्ठान आय। यहिका देवी लक्ष्मी के रसम के रूप मा जाना जात है। रथ-यात्रा ते पँचए दिन, माने आषाढ़ के सुक्ल पच्छ का पाँचवाँ दिन हेरा पंचमी के रूप मा जाना जात है। रथ-यात्रा मा, भगवान जगन्नाथ अपनी अर्धांगिनी महालक्ष्मी का पीछे छोड़ि कै, अपनि भइया बलभद्र अउर बहिन सुभद्रा के साथै अपन दिव्य हथियार सुदर्शन का लइ कै एक दिव्य यात्रा पर निकरति हैं। देवी, देउता के खातिर आपन गुस्सा देखाउती हैं। उइ सुबर्ण महालक्ष्मी के रूप मा याक पालकी मा गुंडीचा मंदिर,अड़प मंडप तक जउती हैं अउर भगवान का जल्दी ते जल्दी मंदिर लौटि आवै के धमकी देति हैं। उनका खुस करै के खातिर, देउता उनका आज्ञा माला (सहमति के माला) दइ के मनावति हैं। देवी का गुस्सा मा देखि कै, सेवक लोग गुंडीचा के मुख्य दुआर बंद कइ देति हैं। महालक्ष्मी नाकाचना गेट ते मुख्य मंदिर मा लौटि अउती हैं। एक अनोखी रसम मा, देवी अपने एक सेवक का नंदिघोष रथ के एक हिस्सा का नुकसान पहुँचावय का आदेस देती हैं। यहिके बादि उइ गुंडीचा मंदिर के बाहिर एक इमली के पेड़ के पीछे छिपि जाती हैं। कुछ देर बादि, उइ हेरा गोहरी लेन के नाँव ते जाने जाय वाले एक अलग रस्ता ते चुपचाप अपने घर-मंदिर का भागि जाती हैं। जगन्नाथजी के लाखन भक्त ई अनोखी रसम का आनंद लेति हैं। श्रीमंदिर की एक महत्वपूर्ण रसम के रूप मा हेरा पंचमी के रसम क जिकिर स्कन्द पुरान मा पावा जात है। मंदिर के इतिहास के अनुसार, यो उत्सव महाराजा कपिलेंद्र देब के समय मा सुरू भा रहै। उनके राज ते पहिले, हेरा पंचमी का मंत्रन के पाठ के साथै प्रतीकात्मक रूप मा मनावा जात रहै। जइस कि मादला पांजी मा कहा गा है, राजा कपिलेंद्र देब सोने के बनी महालक्ष्मी के मूरति लइ कै ई परथा का बदल दिहिन अउर ई परब का अउर जादा नीक बना दिहिन।

चंदन जात्रा या "चंदन परब" 42 दिन का समय है जेहिमा रथन के निर्माण काम के सुरूआत होति है। ई समय का आधा-आधा बांटा गा है, जेहिमा हर एक मा 21 दिन होति हैं। पहिले आधे भाग का बाहिर चंदन कहा जात है, जेहिमा प्रमुख देउतन की प्रतिनिधि मूरतिन का रंगीन जुलूस मा बाहिर निकाला जात है अउर हर दिन नरेंद्र तालाब मा एक अनुष्ठानिक नाव के सवारी कराई जाति है। ई देउतन मा मदन मोहन (जगन्नाथ), राम-कृष्ण, लक्ष्मी, सरस्वती अउर पंच पांडव - पाँच मुख्य शिव मंदिरन के प्रमुख देउता सामिल होति हैं। बाद वाला हिस्सा, जेहिका भीतर चंदन कहा जात है, वहिमा कई अइसी रसमैं होती हैं जिनका जनता के खातिर नहीं खवाला जात। रथन का निर्माण अच्छय तृतीया का, वैशाख के सुक्ल पच्छ के तिसरे दिन, अनुष्ठानिक अगिन पूजा के साथै सुरू होत है। यो पुरी के राजा के महल के सामने अउर पुरी मंदिर के मुख्य कार्यालय की उल्टी दिसा मा होत है। बादि मा देउतन का तालाब के बीच एकु छोटे मंदिर मा पानी, चंदन के लेप, इत्तर अउर फूलन ते भरे पत्थर के टब मा अनुष्ठानिक असनान करावा जात है। ई चंदन परब के समाप्ती सनान जात्रा या "असनान परब" मा होत है जउन जेठ महीना के पूरनमासी के दिन होत है। जगन्नाथ, बलभद्र अउर सुभद्रा का 108 घड़ा पानी ते अन्हवावा जात है अउर फिर उइ लगभग दुई हफ्ता तक प्रतीकात्मक अउर अनुष्ठानिक स्वास्थ्य-लाभ (बीमारी ते उबरै के समय) मा रहति हैं। उनका जनता के दरसन ते रोक दीन जात है। खाली तीन खास पट्ट चित्र, कलफ ते कड़े कीन गै कपड़ा पर प्राकृतिक रंगन ते बनी पारंपरिक ओड़िया चित्रकारी, जेहिका अणसर पट्टी कहा जात है, बाँस के परदा पर टांगि दीन जाति हैं जउन उनका जनता के नजर ते छिपउती हैं। ई समय मा, तीनों देउतन का उनकी बीमारी ठीक करै के खातिर खाली जड़ि, पत्ता, बेरि अउर फल दीन जात है। यह रसम जगन्नाथ पंथ के जनम अउर बिकास मा मजबूत आदिवासी तत्वन के याद दिलावत है। सुरुवाती आदिवासी उपासक बिस्वाबसु, जउन सिकारिन के सरदार रहैं, उनकी बिटिया ललिता अउर ब्राह्मण पुजारी बिद्यापति के संतान दइतापति या दइता के नाँव ते जाने जाति हैं। उनके लगे बीमारी ते उबरै के समय अउर रथ जात्रा या रथ परब के पूरे समय प्रभुजी के सेवा करै का विसेस अधिकार होत है।

जगन्नाथ के सुना बेश- तीनों देउतन के रथ गुंडीचा मंदिर ते मुख्य मंदिर लौटि आवै के बादि, उनका सोने के गहना पहिराए जाति है अउर रथन पर उनकी पूजा कीन जाति है। ई उत्सव का सुना बेश कहा जात है। परंपरा बतावति है कि या प्रथा सबते पहिले राजा कपिलेंद्र देव द्वारा 1460 मा सुरू कीन गै रहै, जब उइ जुद्ध ते जीति कै लउटै के बादि जगन्नाथ का सोना दान कीन्हेनि रहैं। तीनों देउतन का लगभग 208 किलो वजन के सोने के गहनन ते सजावा जात है। 2014 मा 9 जुलाई का भे ई रसम का लगभग नौ लाख भक्तन देखिन रहैं। 2015 मा रथ-यात्रा के मौका पर, 19 साल बादि रथन पर नए रूप (नबकलेबर) मा देउतन के याक झलक पावै के खातिर लाखन भक्त तटीय सहर पुरी मा भीड़ लगा दिहिन। यो ओडिशा मा अब तक का सबते बड़ा धार्मिक सम्मेलन रहै।

2025 के रथ-यात्रा मा डिजिटल तकनीक के जुड़ाव के साथै भक्ति मा एकु बड़ा बदलाव देखा परा। लाखन भक्तन के पारंपरिक रूप ते इकट्ठा होए के साथ-साथ, बड़ी संख्या मा मनई लाइव स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के जरिए वर्चुअली जुड़े, जउन धार्मिक पालन मा याक डिजिटल क्रांति के प्रवेश का देखावत है। 2025 की जात्रा केरी मुख्य बातन मा स्थानीय प्रसासन द्वारा लागू कीन गै भीड़ प्रबंधन के बेहतर रणनीति, ग्लोबल लाइव स्ट्रीमिंग (जेहते जादा लोग सामिल होइ पाइन), अउर पर्यावरण स्थिरता पर ध्यान सामिल रहै। बायोडिग्रेडेबल (आसानी ते सड़ै वाले) चढ़ावा का उपयोग अउर सिंगल-यूज प्लास्टिक का कम करै जइसि पर्यावरण के अनुकूल पहल सुरू कीन गै, जेहिते ई परब पहिले के सालन के तुलना मा पर्यावरण के प्रति जादा जिम्मेदार बना।

रथ यात्रा की तारीखैं

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पुरी के रथ यात्रा
साल सुरुआत

(आषाढ़ शुक्ल द्वितीया)

आखिरी दिन

(रथयात्रा क नौवां दिन)

2015

([नवकलेवर, 2015)

18 जुलाई 26 जुलाई
2016 6 जुलाई 14 जुलाई
2017 25 जून 3 जुलाई
2018 14 जुलाई 22 जुलाई
2019 4 जुलाई 12 जुलाई
2020 23 जून 1 जुलाई
2021 12 जुलाई 20 जुलाई
2022 1 जुलाई 9 जुलाई
2023 20 जून 28 जून
2024 7 जुलाई 15 जुलाई
2025 27 जून 5 जुलाई
2026 16 जुलाई 24 जुलाई
2027 5 जुलाई 13 जुलाई
2028 23 जून 1 जुलाई
2029 13 जुलाई 21 जुलाई
2030 2 जुलाई 10 जुलाई
2031 22 जुलाई 30 जुलाई
2032 9 जुलाई 17 जुलाई
2033 28 जून 6 जुलाई
2034

([नवकलेवर, 2034)

17 जुलाई 25 जुलाई
  1. 1 2 Lochtefeld, James G. (२००२). The Illustrated Encyclopedia of Hinduism: N-Z (अंग्रेज़ी भाषा में). Rosen. पृ. 567. ISBN 978-0-8239-3180-4. १५ अप्रैल २०२३ के मूल से पुरालेखित. ई २३ अप्रैल २०२३ को पुनः प्राप्त कीन गा .{{cite book}}: CS1 maint: date auto-translated (कड़ी)
  2. "Rath Yatra: The legend behind world's largest chariot festival". BBC News (ब्रिटिश अंग्रेज़ी भाषा में). २०१९-०७-०४. १७ फरवरी २०२३ के मूल से पुरालेखित. ई २०२३-०६-१५ को पुनः प्राप्त कीन गा .{{cite news}}: CS1 maint: date auto-translated (कड़ी)
  3. Chakraborty, Yogabrata (२८ जून २०२३). "পুরীধাম ও জগন্নাথদেবের ব্রহ্মরূপ বৃত্তান্ত" [Puridham and the tale of lord Jagannath's legendary 'Bramharup']. dainikstatesmannews.com (Bengali भाषा में). Kolkata: Dainik Statesman (The Statesman Group). मूल से पुरालेखन के तिथि: २८ जून २०२३. ई २८ जून २०२३ को पुनः प्राप्त कीन गा .{{cite web}}: CS1 maint: bot: original URL status unknown (कड़ी) CS1 maint: date auto-translated (कड़ी)
  4. MAHAPRABHU SHRI JAGANNATH CHETNA EVM BHA. ई ४ जुलाई २०२६ को पुनः प्राप्त कीन गा .{{cite book}}: CS1 maint: date auto-translated (कड़ी)
  5. Jagran Desk, Digital (४ जुलाई २०२६). "Jagannath Rath Yatra 2026: पुरी जाने से पहले जान लें रथ यात्रा से जुड़ी हर जानकारी". Jagran (हिन्दी भाषा में). ई ४ जुलाई २०२६ को पुनः प्राप्त कीन गा .{{cite web}}: CS1 maint: date auto-translated (कड़ी)
  6. "यहां निकाली जाती है अनोखी जगन्नाथ रथ यात्रा, तुपकी से दी जाती है सलामी". आज तक (हिन्दी भाषा में). ई २०२१-०७-१३ को पुनः प्राप्त कीन गा .{{cite web}}: CS1 maint: date auto-translated (कड़ी)