हुस्ना बाई
हुस्ना जान या हुसना बाई 19 वीं सदी के अंत अऊर 20 वीं सदी के सुरुआत के दौरान बनारस के एक तवाईफ अऊर ठुमरी गायिका रहीं। उ उत्तर प्रदेश मा खायल, ठुमरी अऊर टापा गायकी मा विशेषज्ञ के रूप मा जानी जात रहीं। 1900 के दशक के सुरुआत मा गायन परंपरा का फिर से परिभाषित अऊर क्रांति लावै, देशभक्ति गीत गावै अऊर दुसरे गायकन का अनुसरण करै के लिए प्रेरित करै का श्रेय उनका जात है।[१] उनका ठाकुर प्रसाद मिश्रा अऊर प्रसिद्ध सारंगी वादक पंडित शम्बूनाथ मिश्रा द्वारा प्रशिक्षित कीन गा रहा, अऊर उ बनारस के पौराणिक छोटे रामदास जी के शिक्षा के तहत टप्पा गायकी मा महारत हासिल किहिन।
कैरियर
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]बाई भारतेंदु हरिश्चन्द्र के समकालीन रहीं, अऊर ओनसे पत्राचार करत रहीं अऊर काव्य अभिव्यक्ति पर ओनके सलाह अऊर राय लिहिन। उनकी ठुमरी अऊर ठुमरी के अन्य उप-विधा मधु तरंग (शर्मा, 2012) के रूप मा प्रकाशित कीन गै रहीं। हरिश्चन्द्र ने उनसे जयदेव द्वारा गीत गोविंद कै रचना भी करावा। उ विद्याबारी अऊर बड़ी मोती बाई के साथ एकै लीग मा मानी जात रहीं, जे थुमरी अऊर टप्पा के कला के स्वामी रहीं। बाई का 'सरकार' या सरदार के रूप मा संदर्भित कीन जात रहा, काहे से कि उ अपने करियर मा बहुत ऊंचाइयन तक पहुँचीं।[२]
राजनीतिक भागीदारी
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]जब एम.के.गांधी असहयोग आंदोलन (1920-22) के दौरान काशी (आधुनिक वाराणसी का एक विशेष पड़ोस) अऊर नैनीताल से होइके यात्रा किहिन, तौ बाई एक आंदोलन का प्रेरित किहिन जेहिमा उनकर महिला गायकन का भजन अऊर देशभक्ति गीत गाके जीवन यापन करै के खातिर मनावै मा प्रभाव रहा। यहिके उद्देश्य इन गायकन के गरिमा बढ़ावै का भी रहा, जेकर काम का अक्सर एक पेशा के रूप मा सेक्स वर्क के बराबर माना जात रहा।[२] इनमा से कईयो गायक बाद मा चरखा आंदोलन मा शामिल होइ गें। गांधी के अनुयायी अमृतार मा सेक्स वर्करन के घरन के बाहर पिकेट करत हैं अऊर जनमत तवैफ अऊर ओन पेशन के खिलाफ होत दिखाई देत है जेका सेक्स वर्क के धारणा के समान फैशन मा माना जात है।[२] बाई ने राष्ट्रीय आंदोलन का समर्थन करै अऊर तवैफन के जीवन मा सुधार करै के दुई उद्देश्यन के साथ 'तवैफ सभा' (काशी के शिष्टाचार महासंघ) का गठन किहिन।[३] सभा के उद्घाटन मा बाई के राष्ट्रपति भाषण वरवधु विवेचन मा उपलब्ध है, (साहित्य सदन, अमृतसर, 1929) उ एक राष्ट्रवादी कविता सुनाइन।[१]
बाई ने साथी तवाईफन का जोन ऑफ आर्क अऊर चित्तौड़गढ़ के औरतन के जीवन से सीखै, सोने के गहना के बजाय लोहे के बेड़ी पहिरै अऊर सम्मानजनक जीवन से दूर रहै का प्रेरित किहिन। काहे से कि तवाईफ आपन पेशा पूरा तरह से नाहीं बदल पावत रहें, बाई ओनका राष्ट्रवादी या देशभक्ति के रचना से आपन पाठ शुरू करै के सलाह दिहिन। उ तवाईफन का सलाह दिहिन कि बनारस के एक अउर प्रसिद्ध तवाईफ गायिका विद्याधारी बाई से ई गीत इकट्ठा कीन जाय। बाई ने तवाईफन के लिए सामाजिक स्थिति अऊर गरिमा प्राप्त करै के दिशा मा एक कदम के रूप मा देखिन। दुसरे तवाईफन के साथे उ गैर-भारतीय सामानन के बहिष्कार मा भाग लिहिन अऊर स्वदेशी आंदोलन का अपनाइन।[२]
सन्दर्भ
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]- 1 2 https://www.huffpost.com/entry/tawaif-non-cooperation-movement_in_5d39a5a2e4b004b6adbbe73f
- 1 2 3 4 https://books.google.co.in/books?id=vU-qEAAAQBAJ&dq=Husna+Bai&pg=PA222&redir_esc=y#v=onepage&q=Husna%20Bai&f=false
- ↑ https://books.google.co.in/books?id=yT9hDwAAQBAJ&dq=Husna+Bai&pg=PA189&redir_esc=y