अष्टावक्र

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अष्टावक्र

अष्टावक्र अद्वैत बेदान्त कय महत्वपूर्ण किताब अष्टावक्र गीता कय ऋषि होंय। अष्टावक्र गीता अद्वैत बेदान्त कय महत्वपूर्ण किताब होय। 'अष्टावक्र' कय मतलब 'आठ जगह से टेढ' होत है। कहा लैं कि अष्टावक्र कय देहि आठ जगह पे टेढ़ रहा।

परिचय[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]

उद्दालक ऋषि कय बेटवा कय नाँव श्‍वेतकेतु रहा। उद्दालक ऋषि कय यक चेला कय नाँव कहोड़ रहा। कहोड़ कय कुल बेदन कय ज्ञान देवैक बाद उद्दालक ऋषि वनकय साथे आपन रूपवती औ गुणवती बिटिया सुजाता कय बियाह कइ दिहिन। कुछ दिन कय बाद सुजाता गर्भवती होइ गइन। यक दिन कहोड़ वेदपाठ करत रहें तो गर्भ के भीत्तर से लरिका कहिस कि पिताजी! आप बेद कय गलत पाठ कीन जात हय। इ सुनतै कहोड़ रिसिआएक बोलिन कि तू गर्भवै से हमार अपमान करत हे इहिकै नाते तैं आठ जगहि पे वक्र (टेढ़ा) होइ जाबे।

हठात् यक दिन कहोड़ राजा जनक कय दरबार में पहुँचे। वहँ बंदी से शास्त्रार्थ में वनकै हार होइ गै। हार होइ जायक नाते वन्है पानी में बुड़ा दिहिन। इ घटना कय बाद अष्टावक्र कय जनम भै। पिता कय न होयक नाते से वन अपने नाना उद्दालक कय आपन पिता औ अपने मामा श्‍वेतकेतु कय आपन भाई समझत रहें। यक दिन जब वन उद्दालक कय कनिया में बैठा रहे तो श्‍वेतकेतु अपने पिता कय कनिया से खींचिकै कहिन कि हट जा तैं हिँया से, इ तोरे पिता कय कनिया नाइ होय। अष्टावक्र कय इ बात नीक नाई लाग औ वन तुरन्तै आपन अम्मा कय लगे आइकै अपने पिता कय बिषय में पूछताछ किहिन। अम्मा अष्टावक्र कय कुल बात सहि सहि बता दींहिन।

अपान अम्मा कय बात सुनैक बाद अष्टावक्र अपने मामा श्‍वेतकेतु कय साथे बंदी से शास्त्रार्थ करै की ताईं राजा जनक कय यज्ञशाला मा पहुँचे। वँह द्वारपाल वन्है रोकिकै कहिन कि यज्ञशाला में लरिकन कय जायक आज्ञा नाई है। यहपे अष्टावक्र कहिन कि अरे द्वारपाल! खाली बार उज्जर होइ जाय पै या उमिर ढेर होइ जाय से केहु बड़ा मनैइ नाई बनि जात। जेका बेदन कय ज्ञान होय औ जे बुद्धि में तेज हय उहै वास्तव में बड़ा होत है। यतना कहिकै वन राजा जनक कय सभा में पहुँचे औ बंदी कय शास्त्रार्थ की ताईं ललकारिन।

राजा जनक अष्टावक्र कय परीच्छा लेवैक नाते पूछिन कि उ मनई के होय जे तीस अवयव, बारा अंश, चौबीस पर्व औ तीन सौ साठ अक्षरन वाली चीज कय ज्ञानी है? राजा जनक कय सवाल कय सुनतै अष्टावक्र बोलिन कि राजन्! चौबीस पच्छ वाला, छः ऋतु वाला, बारह महीना वाला औ तीन सौ साठ दिन वाला संवत्सर आपकय रच्छा करैं। अष्टावक्र कय सही जबाब सुनिकै राजा जनक फिर पुछिन कि उ के होय जे गहिर अउङ्हाई मा भी आपन आँख बन्द नाई करत? जनम लेवैक बादौ मे के नाई चलि पावत ? के बिना हृदय कय है? औ हाली से बढ़ै वाला के होय? अष्टावक्र कहिन कि हे जनक! गहिर अउङ्हाई में मछरी आपन आँखि बन्द नाइ करत। जनम लेवैक बादौ भी अंडा चलि नाइ पावत । पाथर कय हृदय नाई होत है औ हालि हालि बढै वाली नदी होत है।