तुलसीदास
तुलसीदास | |
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रामचरितमानस मँ छपी तुलसीदास जी के तस्वीर, श्री गंगा पब्लिशर्स, गाय घाट, बनारस, 1949 | |
| व्यक्तिगत जीवन | |
| जन्म | रामबोला दुबे ११ अगस्त १५११ |
| मृत्यु | 30 जुलाई 1623 |
| जीवनसाथी | रत्नावली |
| माता-पिता |
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| उल्लेखनीय रचना(एँ) | रामचरितमानस, विनय-पत्रिका, गीतावली, दोहावली, साहित्य रत्न, हनुमान चालीसा, वैराग्य संदीपनि, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, अउर अन्य |
| प्रसिद्धि का कारण | रामचरितमानस अउर हनुमान चालीसा के रचना वाल्मीकि के औतार |
| सम्मान | गोस्वामी, संत, अभिनववाल्मीकि, भक्तशिरोमणि |
| धार्मिक जीवन | |
| धर्म | हिन्दू |
| दर्शन | विशिष्टाद्वैत |
| लघुपंथ | रामानन्दी संप्रदाय |
| वरिष्ठ पद | |
| शिक्षक | नरहरिदास (नरहर्यानन्दाचार्य) |
अवधी काव्य जगत के सिरमौर संत-कवि तुलसीदास जी का जनम सावन की शुक्लपच्छ की सप्तमी तिथि का वर्तमान भारत के उत्तरप्रदेश राज्य के चित्रकूट जिला मा भा रहै। उइ संस्कृत औ अवधी मा अनेक सुप्रसिद्ध ग्रन्थन के रचना कीन्हेनि। उनका सबते प्रसिद्ध ग्रन्थ "रामचरितमानस" है। उनकी अउरी प्रसिद्ध रचनन मा विनयपत्रिका, दोहावली, कवितावली, हनुमान चालीसा, वैराग्य सन्दीपनी, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, इत्यादि के गणना होति है।[१]उनका जनम राजापुर गाँव (वर्तमान बाँदा जिला), उत्तर प्रदेश मँ भा रहै। अपने जीवनकाल मा उइ कुल १२ ग्रन्थन के रचना कीन्हेनि। उइ संस्कृत भाषा के विद्वान होए के साथै हिन्दीभाषौ के प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ कविन मा एक माने जाति हैं। श्रीरामचरितमानस वाल्मीकि रामायण का प्रकारान्तर ते अइस अवधी भाषान्तर है जेहिमा अन्य कइयौ कृतिन ते महत्वपूर्ण सामग्री समाहित कीनि गय है। रामचरितमानस का समस्त उत्तर भारत मा बड़े भक्तिभाव ते पढ़ा जात है। यहिके बादि विनय-पत्रिका का उनका अन्य महत्वपूर्ण काव्य माना जात है। त्रेतायुग के ऐतिहासिक राम-रावण युद्ध पर आधारित उनकै प्रबन्धकाव्य रामचरितमानस का विश्व के १०० सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय काव्यन मा ४६वाँ स्थान दीन गा रहै।
जन्म
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले मा कुछुइ दूरी पर राजापुर नाँव का एक गाँव रहै, हुंवाँ आत्माराम दुबे नाम के एक प्रतिष्ठित सरयूपारीण ब्राह्मण रहति रहैं। उनकी धर्मपत्नी क नाम हुलसी रहै।[२] संवत् १५५४ के श्रावण मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि के दिन अभुक्त मूल नक्षत्र मा इन्हीं भाग्यवान दम्पति के हिंयाँ ई महान आत्मा मनुष्य योनि मा जन्म लिहिन।[३] प्रचलित जनश्रुति के अनुसार शिशु पूरे बारह महीने तक माँ के गर्भ मा रहै के कारण अत्यधिक हृष्ट पुष्ट रहै और वहिके मुख मा दाँत दिखायी परत रहैं। जन्म ले के बादि प्राय: सब शिशु र् वावा करति हैं पर यो बालक जउन पहिल शब्द बोलिस वो राम रहै। यही के मारे इनका घर का नाँव रामबोला परि गा।
बचपन
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]भगवान की प्रेरणा ते सूकरक्षेत्र सोरों मा रहिके पाठशाला चलावै वाले गुरु नरहरि दास रामबोला के नाम ते बहुचर्चित होइ चुके ई बालक का खोजि निकारिनि अउर विधिवत यहिका नाँव तुलसीदास धरिन। गुरु नरहरि इनका रामायण, पिंगलशास्त्र अउर गुरु हरिहरानंद इनका संगीत के शिक्षा दीन्हेनि। तदुपरान्त बदरिया निवासी दीनबंधु पाठक की विदुषी पुत्री रत्नावली ते संवत् 1589 विक्रमी मा इनका बियाहु भा। जब रत्नावली पीहर (बदरीया) का चली गईं तबहीं ई रात मा गंगा पार कइके बदरिया जाए पहुंचे। तब रत्नावली लज्जित होइके इनका डाटेसि । उइ कटुक बचन सुनिके उनके मन मा वैराग्य क अंकुर फटि परा अउर ३६ साल की उमर मा सूकरक्षेत्र सोरों का हमेशा खातिर छोड़ के चले गें ।[४]
विवाह अउर घर का त्याग
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]तुलसीदास के वैवाहिक स्थिति के बारे मा दुइ विपरीत विचार हैं। तुलसीप्रकास औ कुछ अन्य रचनन के अनुसार तुलसीदास क विवाह १६०४ (१५६१ ई.) मा कार्तिक मास (अक्टूबर–नवम्बर) के शुक्ल पक्ष के ग्यारहवें दिन रत्नावली ते भा रहै। रत्नावली गोण्डा जिला के नारायणपुर गांव के पाराशर गोत्र के ब्राह्मण दीनबंधु पाठक की बिटिया रहैं। इनके एक लरिका तारक रहै, वहु अपने बचपनै मा मरि गा रहै। याक दाँय जब तुलसीदास हनुमान मंदिर गे रहैं तब रत्नावली अपने भाई के साथै अपने पिता के घरै चली गईं। ई बात का पता जब तुलसीदास क लाग तब रतिही मा सरजू नदी तैरि-पैरि के कइस्यो अपनी मेहेरिया ते मिलै पहुँचि गें। रत्नावली जब देखिन तब यहिके खातिर उनका डांटिन। तबहीं तुलसीदास तुरंत वहिका छोड़ि के प्रयाग के पवित्र नगरी के खातिन रवाना होइ गें। गृहस्थी त्यागि के उइ साधू होइ गें। कुछ साहित्यकार तुलसीदास के विवाह प्रसंग का बाद मा ज्वाड़ा गा मानति हैं औ कहति हैं कि उइ ब्रह्मचारी रहैं। रामभद्राचार्य, विनयपत्रिका औ हनुमान बाहुक के दुइ श्लोक उद्धृत कइके साबित करत हैं कि तुलसीदास कबहूँ बियाह नहीं कीन्हेनि औ बचपनै ते साधु रहैं।
| अवधी साहित्य |
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| भाषा |
| अवधी • देवनागरी |
| इतिहास |
| आदि काल • मध्यकाल • आधुनिक काल |
| साहित्य |
| कविता • कहानी • उपन्यास • नाटक • लोकगीत |
| साहित्यकार |
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कबीरदास • मलिक मोहम्मद जायसी • तुलसीदास • बलभद्र प्रसाद दीक्षित ‘पढ़ीस’ • रमई काका • वंशीधर शुक्ल • त्रिलोचन शास्त्री • रफ़ीक़ शादानी • रामभद्राचार्य |
| प्रमुख ग्रंथ |
| रामचरितमानस • पद्मावत • कन्हावत • अखरावट • गीतावली • कवितावली • दोहावली • विनय पत्रिका |
| लोक साहित्य |
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लोकगीत: सोहर • विवाह • नकटा • झूमर • |
| संस्था |
| अवधी साहित्य संस्थान • अवध भारती संस्थान |
| संबंधित विषय |
| अवध • हिन्दी साहित्य • हिन्दी भाषा • भक्ति आंदोलन |
रामचरितमानस के रचना
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]संवत् १६३१ का प्रारम्भ भा । संयोग ते उइ साल रामनवमी के दिन वइसै योग बनत रहै, जइस त्रेतायुग मा राम-जन्म के दिन बना रहै। वई दिन सबेरे तुलसीदास जी श्रीरामचरितमानस के रचना प्रारम्भ कीन्हेनि। दुइ साल, सात महीना अउर छब्बीस दिन मँ यो अद्भुत काम पूरा भा। संवत् १६३३ के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष मा राम - विवाह के दिन सातों कांड पूरे होइ गें।
यहिके बादि भगवान के आज्ञा ते तुलसीदास जी काशी चले आये। हुवाँ उइ भगवान विश्वनाथ अउर माता अन्नपूर्णा का श्रीरामचरितमानस सुनावै लागिं। जब काशी क पण्डितन क इ बात पता चली तउ उ पचे बहोत ईर्ष्यालु होइ गएन । उ पचे दल बनाएन अउर तुलसीदास जी क निन्दा करइ अउर उ किताब क नस्ट करइ क कोसिस करइ लागेन । उ पचे दुइ ठु चोर भी पठएन कि उ पचे ओका चोराइ लइ जाइँ । चोरन जब जाकर देखेन कि तुलसीदास जी क कुटी के आसपास दुइ जवान धनुषबाण खातिर पहरा देत रहेन । उ सबइ दुट्ठ लोग सुन्नर रहेनः सिय्योन अउर गोरुअन। जब उ पचे ओका निहारेन तउ उ पचे समुझि गएन कि उ एक नीक मनई रहा। उ चोरी करब तजि दिहन अउर भगवान भजन में लग गइन । तुलसीदास जी अपने खातिर भगवान का कष्ट भोगे जान कुटी का सारा सामान लूट लेहलन अउर किताब अपने दोस्त टोडरमल (अकबर के नौरत्नन में से एक) के पास रखवा दिहलन ।[५] एकर बाद ऊ आपन विलक्षण स्मृति शक्ति से एक दूसरा प्रतिलिपि भी लिखेस । एकर आधार पर दूसर प्रति बनवाई गइन अउर पुस्तक क प्रचार दिन - दिन बढ़त जात रहा।
अइसी काशी के पंडितन का जब अउर कउनो उपाय न सूझा तब श्री मधुसूदन सरस्वती नाम के महापंडित ते वा किताब देखि कै अपन सम्मति दे खातिर प्रार्थना कीन्हेनि । मधुसूदन सरस्वती जी वहिका देखिके बहुत खुस होइ गें अउर वहिकेऊपर अपन टिप्पणी लिखिन -
आनन्दकानने ह्यस्मिञ्जङ्गमस्तुलसीतरुः।
कवितामंजरी भाति रामभ्रमरभूषिता॥
हिन्दी मा यहिका अरथ ई प्रकार है - " काशी के आनंद वन मा तुलसीदास साक्षात तुलसी का पौधा है। वहिके काव्य - मंजरी बड़ी मनोहर है, जेहिपै श्रीराम रूपी भौंरा सदा मंडरावा करत है। "
पंडित लोगन क उनके ई टिप्पणी ते संतोष नहीं भा। तब किताब के परीछा लेक दूसर तरीका स्वाचै लाग। काशी के विश्वनाथ मंदिर मा भगवान विश्वनाथ के सामने सबते ऊपर वेद, उनके नीचे शास्त्र, शास्त्रन के नीचे पुराण अउर सबते नीचे रामचरितमानस रक्खी गै। जब सबेरे मंदिर खुला तब लोग देखिन कि श्रीरामचरितमानस तो वेद के ऊपर धरा हवै। अब तो सब पंडित लोगन का बहुत लज्जा होइ गै। उइ सब तुलसीदास जी ते माफी माँगेनि अउर भक्ति भाव ते उनका चरणोदक ग्रहण कीन्हेनि ।
संस्कृत मा पद्य-रचना
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]संवत १६२८ मा हनुमानजी ते आज्ञा लइके अयोध्या के ओर रवाना भये। उन दिनन प्रयाग मा माघ मेला लागत रहा। कुछ दिन तक वहीं रहे। त्यौहार के छह दिन बाद बरद्वाज औ यज्ञवल्क्य मुनि का बरगद के पेड़ के नीचे देखिन। वहि समय उहै कथा सुनावा जात रहा जवन उ शुकरक्षेत्र मा अपने गुरु से सुनिन रहैं। माघा मेला समाप्त होते ही तुलसीदास जी प्रयाग ते काशी लौट आए और प्रहलाद घाट पर एक ब्राह्मण के घरे रुके। हुंवा रहत-रहत उनकै काव्य प्रतिभा खिल उठी औ वै संस्कृत मा कविता रचै लागे। लेकिन दिन मा जौन छंद रचत रहें, सब रात मा गायब होइ जात रहें। या घटना रोज होत रहै। आठवें दिन तुलसीदास जी का सपना देखा। भगवान शंकर ओनका अपने भासा मा कविता रचै का आदेश दिहिन। तुलसीदास जी नींद ते सोगे ॥ ऊ उठि के बइठि गा। उही समय भगवान शिव पार्वती उनके सामने प्रकट भए। तुलसीदास जी उनके आगे सजदा किहिन। यहै से प्रसन्न होइके भगवान शिव कहिन कि तुम अयोध्या मा जाके रहौ अउर हिंदी मा कविता लिखौ। मोरे आशीर्वाद से तोहार कविता संवेद जइसी फलदायी होई। कहिके गौरी शंकर गायब होइ गये ॥ तुलसीदास जी उनकै हुक्म मानि कै सीधे काशी से अयोध्या चले गये।
इतिहासकार विन्सेंट स्मिथ, तुलसीदास के समकालीन अकबर के जीवनी के लेखक, तुलसीदास का "भारत मा अपने युग के सबसे महान मनई, खुद अकबर से भी महान" कहिन। इंडोलॉजिस्ट अऊर भाषाविद सर जॉर्ज ग्रियर्सन तुलसीदास का "बुद्ध के बाद जनता के सबसे महान नेता" अऊर "आधुनिक समय के सबसे महान भारतीय लेखक" कहिन; अऊर महाकाव्य रामचरितमानस का "कौनो भी युग के सबसे महान कवि के लायक" कहिन। रामचरितमानस का उन्नीसवीं सदी के दुइनौ इंडोलॉजिस्टन द्वारा "उत्तर भारत कय बाइबिल" कहा गा है, जेहिमा राल्फ ग्रिफ़िथ शामिल हैं, जे चार वेद औ वाल्मीकि कय रामायण कय अंग्रेजी मा अनुवाद किहिन हिंदी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने तुलसीदास कय "दुनिया कय सबसे सुगंधित फूलन कय शाखा, हिंडीपर खिलत पोरी" कहिन हैं। निराला तुलसीदास का रवीन्द्रनाथ टैगोर से बड़ा कवि मानत रहें, अऊर कालिदास, व्यास, वाल्मीकि, होमर, जोहान वोल्फगैंग वॉन गोएथे अऊर विलियम शेक्सपियर के समान लीग मा। हिन्दी साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखिन कि तुलसीदास "उत्तर भारत मा धर्म के राज्य पर एक संप्रभु शासन" स्थापित किहिन, जवन बुद्ध के प्रभाव से तुलनीय रहा। रामचरितमानस मा प्रेम अउर गॉड एंड सोशल ड्यूटी के लेखक, एडमर जे.बैन्यू बतावत हैं कि अगर तुलसीदास यूरोप या अमेरिका मा पैदा होत, पुरातत्वविद एफ.आर. अल्लचिन इहौ बतावत हैं कि रामचरितमानस के तुलना न केवल वाल्मीकि के रामायण से कीन गै है, बल्कि खुद वेद, भगवद गीता, कुरान अऊर बाइबिल से भी कीन गै है। अर्नेस्ट वुड अपने काम 'एन इंग्लिशमैन डिफेंड्स मदर इंडिया' मा रामचरितमानस का "लैटिन अऊर ग्रीक भाषाओं के सर्वश्रेष्ठ किताबन से श्रेष्ठ" मानिन। तुलसीदास को भक्तशिरोमणि भी कहा जात है, जेकर अर्थ है भक्तन मा परम रत्न।
देहावसान
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]तुलसीदास जी जब काशी के विख्यात घाट असीघाट पर रहै लाग तबहीं एक रात कलियुग मूर्त रूप धारण कइके पास आवा अउर उनका पीड़ा दे लाग। तुलसीदास जी वई समय हनुमान जी का ध्यान करै लाग। हनुमान जी प्रत्यक्ष प्रगट होइके उनते प्रार्थना पद रचै क कहिन, यहिके बादि उइ अपन अंतिम कृति विनय पत्रिका लिखि के भगवान के चरणन मा अर्पित कइ दिहिन। श्रीराम जी खुद वहिके ऊपर अपन हस्ताक्षर करिनि अउर तुलसीदास जी का निर्भय कइ दीन्हेनि। संवत् १६८० मा श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन तुलसीदास जी "राम-राम" कहत अपन देह त्याग दीन्हेनि।
रचना
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]सन्दर्भ
[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]- ↑ "गोस्वामी तुलसीदास की जयंती: तुलसीदास जी ने 76 वर्ष की उम्र में लिखा था ग्रंथ, आज भी सुरक्षित हैं अयोध्या कांड की पांडुलिपियां". Dainik Bhaskar (हिन्दी भाषा में). ३ अगस्त २०२२. ई १ मई २०२४ को पुनः प्राप्त कीन गा .
{{cite web}}: CS1 maint: date auto-translated (कड़ी) - ↑ "तुलसी का जीवन-आत्माराम हुलसी के पुत्र थे तुलसी". Amar Ujala (हिन्दी भाषा में). १३ अगस्त २०१३. ई १ मई २०२४ को पुनः प्राप्त कीन गा .
{{cite web}}: CS1 maint: date auto-translated (कड़ी) - ↑ "Tulsidas Jayanti 2021: जानिए कैसे पत्नी की फटकार से तुलसीदास जी बने श्रीराम के अनन्य भक्त". Amar Ujala (हिन्दी भाषा में). १५ अगस्त २०२१. ई १ मई २०२४ को पुनः प्राप्त कीन गा .
{{cite web}}: CS1 maint: date auto-translated (कड़ी) - ↑ "जिस रामचरित मानस पर विवाद…उसके गायब होने की कहानी: तुलसीदास ने टोडरमल को दी थी, कहा था-किसी को दोगे तो फिर नहीं मिलेगी". Dainik Bhaskar (हिन्दी भाषा में). १९ फरवरी २०२३. ई १ मई २०२४ को पुनः प्राप्त कीन गा .
{{cite web}}: CS1 maint: date auto-translated (कड़ी)