ग्रामर्षि शिवदास आत्रेय
ग्रामर्षि शिवदास आत्रेय अवधी भाषा के साहित्यकार अहै।
ग्रामर्षि शिवदास आत्रेय आत्मज श्री सोमन यादव माता श्रीमती छोटका का पुत्र और ग्राम अतरसुमां कलां पत्रालय अतरसुमां धनपतगंज जनपद सुलतानपुर का निवासी हूं । जन्मतिथि 22 दिसम्बर 1939 ई ० तथा कक्षा आठ तक शिक्षित हूं । गृहस्थ आश्रम का निर्वाह करते हुए कृषक भार युक्त जीवन होने के कारण अनेक भौतिक समस्यायें परिस्थितियों से संघर्षशील होकर इकलौता पुत्र होने के कारण पारिवारिक व्यवस्था में भी सारा जीवन खपाने में अस्त - व्यस्त रहना पड़ा, कृषी कार्य करना, हल चलाना, भैंस - गाय चराना, घास छीलना, निराई - गुड़ाई करना जीवनीय उद्योग रहा। ऋषि परम्परा युक्त जीवन साधना करते हुए ग्रामवासी होने के कारण अपने को ग्रामर्षि मानता हूं। अत्रि गोत्रीय होने के कारण ऋषि वंशज का प्रमाण देने हेतु आत्रेय लिखता हूं। गोत्रीय प्रमाण को जागृत करना ही सनातन संस्कृति का विधान एवं अपनी मानवता का संरक्षण करना है।
कविता की प्रेरणा कैसे बनी ?
मैं लगभग 18-19 साल का था। बरसात का समय था । अपने कार्य भार अनुसार गाय - भैंस लेकर उन्हें चराने गया। साथ में अन्य चरवाह नहीं थे। मैं अकेला था एकाएक बादल घिर गये, गरजने लगे। बिजली ने भी अपनी चमक - दमक प्रकट की, पर गाय - भैंस शान्त चित से चर रहे थे। मैं भी शान्त भाव से खड़ा था। छाता लगाये हुए प्रकृति की छटा का अवलोकन करते हुए आनन्द ले रहा था। एकान्त और अकेलेपन की मानसिकता अनुसार नारी के प्रति सहिष्णुता का भाव उभरा और उसी मानसिक आनन्द के प्रवाह में स्वतः मुख से यह वाणी फूट पड़ी कि - " मारि मारि सैंया मोसे गोहुवां पिसावें "। इस भावना ने मुझे और झकझोरा तो दो - चार लाइनों का टेड़ा मेड़ा गीत बन गया । मन में ऐसी प्रसन्नता हुई जैसे कोई निधि मिल गई। बस इस कविता की भावना की प्रियता को मैंने अपनी आदत स्वरूप बनाने का प्रयास किया, क्रम चल पड़ा विचार बनाता रहा तो विचार भी मिलते रहे। विचारों को तुक तर्क से मिलाकर लिखने का जीवनीय अंग बना लिया। प्रयास परिश्रम समय सृजन अन्तर्चाह ही भाव विस्तार के प्रमुख साधन बनें। आध्यात्मिक लगाव तो मुझे बचपन से रहा है। कविता की भावना तन, मन, बल, बुद्धि मन विचार में समा गया। अकेला होने के कारण गृहकार्य का भार भले था पर रास्ता चलते, खेत में काम करते, सोते - जागते जभी समय मिलता तभी उसी में मन चित लगाता रहा, समय व्यर्थ न जाने देता। कागज कलम हमेशा साथ रखता, चिन्तन मनन उसी विचार पर करता रहता जो अन्तर्मन में जो भाव उभरता उसे लिख लेता। आज तक लिखने में थकावट का आभास नहीं हुआ। ज्ञान में विचार में साधना में निरन्तर परिवर्तन होता चला गया। बचपन काल से आज तक के भाव विचार में बहुत अन्तर है। संयम, धैर्य, सन्तोष के साथ जीवन निभाते हुए जो कुछ प्रेरणाओं से मिलता रहा उसे लिखता रहा। जबकि मैं न तो विद्वान हूँ, न साधक सन्त हूं, न योगी यती हूं, न बहुत बड़ा सत्संगी हूं, केवल स्वाध्याय के बल पर अपने लेखन प्रक्रिया को विस्तार दे सका हूं ।
ग्रामर्षि शिवदास आत्रेय द्वारा लिखित पुस्तकों का परिचय इस प्रकार है : -
संकलित एवं संस्कृत में हस्त लिखित पुस्तकें-
- आचार्योपनिषद
- जीवनोपनिषद
- वेद महापुराण
- ब्रह्म वेद
- सप्तसूक्तम
- प्रज्ञा चरितम्
- अत्रि संहिता
- अत्रि स्मृति
- आत्रेय वेदांग
- आत्रेय धर्मशास्त्र
- अमरकथा प्रसंग
- मृतक मोक्ष क्रिया
- नित्योपासना
- जीवन ज्योति
शिक्षा एवं विद्या विद्यालय के सन्दर्भ में
- बाल शिक्षा शास्त्र
- विद्यार्थी गायन
- जीवन विद्या विज्ञान
- उदय गाथा ,
- गंगा स्मारिका
- गायत्री प्रज्ञा धाम गाथा
- बाल अन्तयाक्षरी
- गोत्रीय परिचय पत्रिका
- शिवम भाष्य
- शिवम योग दर्शन
- युवा जीवन प्रकाश
- शिव ज्ञानामृत
- बाल शिक्षा संस्कार ( तीन भाग )
- मानव संहिता
- सामाजिक दिग्दर्शिका
- जीवन गौरव गाथा
- आराध्य सत्ता के दोषों का खण्डन लेख
आध्यात्मिक पुस्तके-
- श्री दुर्गा सप्तशती पाठ
- देवी शतक
- देवी स्तवन
- देवी भागवत
- सन्तोषी माता व्रत कथा
- अनुसूइया व्रत कथा
- श्री हनुमान चरित
- श्रीरामचरित पारस ( दो भाग )
- शिव शक्ति कथा
- मानस मंगल पाठ
- मानस मंगल कथा
- श्रीमद्भगवदगीता कथा
- श्रीकृष्ण चरित मानस
- कृष्णायन
- शिवायन
- हनुमतायन
- गायत्री ज्ञान गीता
- आत्म बोधक विचार
- अमर कथा प्रसंग
- प्रज्ञा साधना
- प्रज्ञा वाणी
- चेतना चिन्तन
- चेतना स्मृति
- चेतना वाणी ( बीस भाग )
- जीवन दैनन्दिनी
- श्री प्रज्ञायन
- गीता ज्ञान गंगा
- सनातन जीवन योग
- गोत्रीय परिचय पत्रिका
- प्रज्ञासुर संग्राम
आत्रेय सम्बन्धित पुस्तकों का नाम-
- अत्रि अंश आत्रेय
- आत्रेय परिचय पत्रिका
- जाति एकता सूत्र आत्रेय
- , यादव वर्ग क्या ? क्यों ? कैसे ?
- आत्रेय संहिता
- आत्रेय गीता
- आत्रेय चन्द्रोदय
- आत्रेय पत्रावली
- आत्रेय दिग्दर्शिका
- आत्रेय ज्ञान गौरव
- आत्रेय सुधा
- आत्रेय संजीवनी
- आत्रेय योग दर्शन
- आत्रेय जीवन जागरण
- आत्रेय ज्योति गान
- आत्रेय वर्ग निवेदन
- गोत्र गौरव जागरण
- आत्रेय वर्ग निवेदन
- आत्रेय जागरण हेतु पत्र - पत्रिकायें आदि ग्रंथों का आलेखन किया ।
लोक गीतों की श्रृंखला में
- गाम्य गायन
- भक्त गायन
- युग गायन
- पद्य परिक्रमा
- पथ परिवर्तन
- रसांजना
- चलते - चलते
राष्ट्रीय विज्ञ, वेदज्ञ, तत्वज्ञ एवं सर्वज्ञ ज्ञानदाताओं के समक्ष प्रेषित करके इस आशा अभिलाषा में संग्रहीत होता हूं कि त्रुटियों को दूर कर पठन-पाठन-मनन की सुविधा पाकर आत्मिक बन्धु के समान आशीर्वचन प्रदान करेंगे। आपकी प्रसन्नता ही हमारी प्रसन्नता है। भूल अनबन के लिए क्षमा आशायें तरंगित हैं।”