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प्रेमचन्द

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मुंशी
प्रेमचंद
सन् १९३० ई. मा प्रेमचंद
जनमधनपत राय श्रीवास्तव
३१ जुलाई १८८०
लमही, बनारस रियासत, ब्रिटिस भारत (वर्तमान उत्तर प्रदेश, भारत)
निधन८ अक्टुबर १९३६(1936-10-08) (आयु वर्ष - ५६)
बनारस,बनारस रियासत,अंग्रेजी राज (वर्तमान वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत)
उपनाँवप्रेमचंद,नवाब राय
पेशाउपन्यासकार,कथाकार
भाषाहिंदी, उर्दू
राष्ट्रीयताभारतीय
प्रमुख रचनाकुलगोदान, बाज़ार-ए-हुस्न, कर्मभूमि, शतरंज के खिलाड़ी, गबन, मानसरोवर, ईदगाह
सक्रियता साल१९२०-१९३६
जीवनसाथीअज्ञात(बि. 1895;तलाक), सिवरानी देवी (बि॰ १९०६; नि॰ १९३६)[]
संतानअमृत राय

दसखत

प्रेमचंद (३१ जुलाई १८८०- ८ अक्टूबर १९३६)(Hindustani pronunciation: [preːm t͡ʃənd̪] ) का शुमार हिन्दी अउर उर्दू के सर्वश्रेष्ठ भारतीय लेखकन मा होत है। उनका मूल नावँ धनपत राय श्रीवास्तव रहै। प्रेमचंद का नवाब रायमुंशी प्रेमचंद कय नावँ ते जाना जात है। प्रेमचंद हिंदी अउर उर्दू उपन्यास साहित्य के पुरोधा रहैं। सन १८८० के आसपास जाति व्यवस्था और महिलन के दुर्दसा का चित्रण करै वाले सर्वप्रथम लेखकन मा ते एक हैं। प्रेमचंद जी का पहिल कथा संग्रह सोज़े वतन सन १९०७ मा प्रकाशित भा रहै। प्रेमचंद जी दर्जन भर ते अधिक उपन्यास अउर ३०० ते ज्यादे कहानिन के रचना करिन। उनके अनेक उपन्यास अउर कहानिन का विदेसी भासन मा अनुवाद भा है।

प्रेमचंद का जनम 31 जुलाई 1880 का बनारस के लगे लमही नाँव के एक गाँव मा भा रहै। छुटपने मा उनका नाँव धनपत राय ("धन का स्वामी") रखा गा रहै। इनके पूर्वज बड़े चित्रगुप्तवंशी कायस्थ रहैं, जिनके लगे आठ ते नौ बिगहा जमीन रहै। इनके दादा गुरुसहायराय पटवारी (गाँव के जमीन के अभिलेख रखने वाले) रहैं अउर इनके पिता अजयबलाल डाकघर के चपरासी रहैं। इनकी महतारी आनंदी देवी करौनी गाँव की रहै वाली रहैं, जो संभवतः इनके "बड़े घर की बेटी" मा आनंदी किरदार के लिए इनकी प्रेरणौ रहीं। धनपत राय अजयब लाल और आनंदी की चउथि संतान रहैं; पहिले दुई बिटेवा रहैं मुला उइ छोटेहे मा मर गईं, अउर याक तीसर बिटेवा रहै जेहिका नाँव समा रहै। उनके चाचा, महाबीर, एक अमीर जमींदार रहैं, वई उनका " नवाब " उपनाम दिहिन। "नवाब राय" धनपत राय जी द्वारा चुना गा पहिल उपनाम रहै। []

मुंशी प्रेमचंद मेमोरियल गेट, लमही, वाराणसी

सात साल की उमर मा धनपत राय लमही के लगे लालपुर, वाराणसी के एक मदरसा मा अपनि शिक्षा शुरू किहिन। अउर मदरसा मा एक मौलवी ते उर्दू अउर फारसी सीखेनि । जब उइ 8 साल के रहैं, तब उनकी महतारी क्यार लंबी बीमारी के बाद निधन होइ गा। वहिके बादि उनकी दादी, उनका पालै-प्वासै के जिम्मेदारी लिहिन, मगर कुछ दिन बादि उनहुँन क देहावसान होइ गा। [] मुंशी प्रेमचंद अलग-थलग महसूस करत रहे, काहे से कि उनकी बड़ी बहिन सुग्गी के शादी होइ चुकी रहै, अउर उनके पिताजी हमेशा काम मा व्यस्त रहत रहैं। उनके पिता गोरखपुर मा तैनाती के दौरान दुबारा शादी किहिन, लेकिन प्रेमचंद का उनकी सौतेली महतारी ते बहुत कम स्नेह मिला। 'सौतेली महतारी' बाद मा प्रेमचंद के रचना मा आवर्ती विषय बन गै।

बचपनै मा धनपत राय के रुचि कथा उपन्यासन के प्रति होइ गै। तबहीं एक तमाखू वाले की दुकान पर उइ फारसी भासा के काल्पनिक महाकाव्य तिलिस्म-ए-दिलरुबा की कहानी सुनेनि। फिर एक थोक किताब विक्रेता खियां किताबै ब्यांचै का काम किहिन। ई काम मा उनका खुब किताबै पढ़ै का मौका मिला। उइ एक मिशनरी स्कूल मा अंग्रेजी सीखिन अउर जॉर्ज डब्ल्यूएम रेनॉल्ड्स के आठ खंडन के द मिस्ट्रीज ऑफ द कोर्ट ऑफ लंदन सहित कथासाहित्य के कईयो कामन का अध्ययन किहिन। गोरखपुर मा अपनि पहिलि साहित्यिक रचना किहिन, जउन कबहूँ प्रकाशित नाइ भै औ अब खो गै है। यो एक कुंवारे पर एक तमाशा रहै जो एक निम्न जाति की औरत ते प्यार करत है। यहु चरित्र प्रेमचंद के चाचा पर आधारित रहै, जो उनका कथा-साहित्य पढ़ै के जुनून के खातिर डांटत रहैं; यो तमाशा शायद यहीके बदला के रूप मा लिखा गा रहै। []

1890 के दशक के मध्य मा अपने पिता के जमानिया मा तैनात होए के बाद, धनपत राय बनारस के क्वींस कॉलेज मा विद्वान के रूप मा दाखिला लिहिन। 1895 मा, जब उइ नौवीं कक्षा मा पढ़त रहैं, तब 15 साल के उमर मा उनकर बियाह होइ गवा। ई मैच उनके मातृक सौतेला दादा द्वारा आयोजित कीन गा रहा। ऊ लड़की एक अमीर जमींदार परिवार से रही अऊर प्रेमचंद से बड़ी रही, जे ओका झगड़ालू अऊर सुन्नर नाहीं पावत रही। [] []

लंबी बीमारी के बाद 1897 में उनके पिताजी का निधन होइ गवा। उ दूसरा वर्ग (60% अंक से नीचे) के साथ मैट्रिक परीक्षा पास करै में कामयाब रहे। हालांकि, क्वींस कॉलेज मा केवल पहिला संभाग वाले छात्रन का फीस रियायत दीन जात रही। तब उ सेंट्रल हिन्दू स्कूल मा दाखिला मांगिन लेकिन अंकगणित के कमजोर कौशल के कारण उ असफल रहे। यहि तरह, ओनका आपन पढ़ाई बंद करै का पड़ा। तब उइ बनारस मा एक अधिवक्ता के बेटवा का पांच रुपिया के मासिक वेतन मा कोचिंग देय का असाइनमेंट प्राप्त किहिन। ऊ अधिवक्ता के अस्तबल के ऊपर एक कीचड़ के कोठरी मा रहत रहा अऊर आपन वेतन का 60% घर वापस भेजत रहा। [] इन दिनन मा प्रेमचंद खूब पढ़िन। कई कर्ज जमा करै के बाद, 1899 मा, उ आपन एकत्रित किताबन मा से एक का बेचै के लिए एक किताबन के दुकान मा गें। वहिमा, उ चुनार के एक मिशनरी स्कूल के हेडमास्टर से मिले, जे ओनका ₹18 के मासिक वेतन पर एक शिक्षक के रूप मा नौकरी के पेशकश किहिन। [] उ ₹5 के मासिक शुल्क पर एक छात्र का ट्यूशन पढ़ावै का काम भी लिहिन।

1900 मा, प्रेमचंद ने सरकारी जिला स्कूल, बहराइच मा ₹20 के मासिक वेतन पर सहायक शिक्षक के रूप मा नौकरी प्राप्त किहिन। तीन महीना बाद, उनका प्रतापगढ़ के जिला स्कूल मा स्थानांतरित कीन गा रहा, जहां उ एक प्रशासक के बंगला मा रहे अऊर अपने बेटवा का ट्यूशन पढ़ावत रहे।

उनकर पहिला लघु उपन्यास असरार-ए-माबिद ("भगवान के निवास के रहस्य", हिंदी मा देवस्थान रहस्य ) रहा, जवन मंदिर के पुजारियन के बीच भ्रष्टाचार अऊर गरीब औरतन के यौन शोषण का पता लगावत है। ई उपन्यास बनारस स्थित उर्दू साप्ताहिक आवाज-ए-खलक मा 8 अक्टूबर 1903 से फरवरी 1905 तक एक श्रृंखला मा प्रकाशित कीन गा रहा। साहित्यिक आलोचक सिगफ्राइड शुल्ज़ कहत हैं कि "उनके पहिला उपन्यास मा उनकर अनुभवहीनता काफी स्पष्ट है", जवन सुव्यवस्थित नाहीं है, एक अच्छा कथानक अऊर विशेषता के कमी है। प्रकाशचन्द्र गुप्ता इका "अपरिपक्व रचना" कहत हैं, जवन "जीवन का केवल काला या सफेद मा देखै" के प्रवृत्ति देखावत है। []

प्रतापगढ़ से, धनपत राय का प्रशिक्षण के लिए इलाहाबाद स्थानांतरित कीन गा रहा अऊर बाद मा 1905 मा कानपुर मा तैनात कीन गा रहा। उ लगभग चार साल तक कानपुर मा रहे, मई 1905 से जून 1909 तक। वहिजा, उ उर्दू पत्रिका जमाना के संपादक मुंशी दया नारायण निगम से मिले, जेहिमा उ बाद मा कईयो लेख अऊर कहानी प्रकाशित किहिन।

प्रेमचंद गर्मी के छुट्टी मा अपने गांव लम्ही मा गये रहैं पै कइयौ कारन से रहैं का मजा नहीं आवा रहै। उनका मौसम या वातावरण लेखन के अनुकूल नाहीं लाग। यही से, अपनी पत्नी अऊर अपनी सौतेली महतारी के बीच झगड़ा के कारण उनका घरेलू परेशानी का सामना करै का पड़ा। प्रेमचन्द अपनी मेहरारू का गुस्सा मा डांटिन जब मेहरारू फांसी लगाय के आत्महत्या करै कै असफल कोशिश करिन। निराश होइके, ऊ अपने पिता के घरे चली गै, अऊर प्रेमचंद ओका वापस लावै मा कौनो दिलचस्पी नाहीं देखाइस। 1906 मा प्रेमचंद कय बियाह एक बाल विधवा शिवरानी देवी से भा, जवन फतेहपुर कय पास एक गाँव कय एक जमींदार कय बिटिया रही। [] ई कदम उ समय क्रांतिकारी माना जात रहा, अऊर प्रेमचंद का बहुत सामाजिक विरोध का सामना करै का पड़ा। इनके निधन के बाद शिवरानी देवी इनके ऊपर यक किताब लिखिन, जेकर शीर्षक रहा प्रेमचंद घर में ("घर पर प्रेमचंद")।

1905 मा, राष्ट्रवादी सक्रियता से प्रेरित होइके, प्रेमचंद ने जमाना मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता गोपाल कृष्ण गोखले पर एक लेख प्रकाशित किहिन। उ राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करै के लिए गोखले के तरीकन के आलोचना किहिन अऊर वहिके बजाय बाल गंगाधर तिलक द्वारा अपनाए गए अउर चरमपंथी उपायन का अपनावै के सिफारिश किहिन। प्रेमचंद कय पहिली प्रकाशित कहानी "दुनिया का सबसे अनमोल रतन" ("दुनिया कय सबसे अनमोल गहना") रही, जवन 1907 मा जमाना मा छपी रही। [१०] यहि कहानी के अनुसार सबसे अनमोल 'रत्न' आजादी पावै कय खातिर आवश्यक खून कय आखिरी बूंद रहा। प्रेमचंद के कईयो शुरुआती लघुकथाओं मा देशभक्ति के सुर रहे, जवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित रहे। []

प्रेमचंद कै दुसरा लघु उपन्यास हमखुरमा-ओ-हमसवब (हिंदी मा प्रेमा ) 1907 मा प्रकाशित भा रहा, "बाबू नवाब राय बनारसी" नाम से लिखा गा रहा। ई समकालीन रूढ़िवादी समाज मा विधवा पुनर्विवाह के मुद्दा का पता लगावत है: नायक, अमृत राय, अपनी अमीर अऊर सुंदर मंगेतर प्रेमा का त्याग करत हुए, युवा विधवा, पूर्णा से शादी करै के सामाजिक विरोध का दूर करत है। प्रकाश चन्द्र गुप्ता के अनुसार, "कई मायनों मा उनके भविष्य के महानता के बीज समाहित करत हुए, उपन्यास अबहियों युवा है अऊर अनुशासन के कमी है जवन पूर्ण परिपक्वता लावत है"।

सन १९०७ मा बनारस के मेडिकल हॉल प्रेस से प्रेमचंद कै एक अउर लघु उपन्यास किशना प्रकाशित भा। गहना के प्रति औरतन के लगाव पै व्यंग्य करै वाली ई 142 पन्नन कै रचना अब खो गै है। साहित्यिक आलोचक नोबत राय ने ज़माना मा काम के आलोचना किहिन, अऊर ईका महिलाओं के हालात का मजाक बताइन।

अप्रैल-अगस्त 1907 के दौरान, प्रेमचंद के उपन्यास रूठी रानी जमाना मा धारावाहिक रूप मा प्रकाशित कीन गा रहा। साथै 1907 मा, जमाना के प्रकाशकन प्रेमचंद के पहिला लघुकथा संग्रह प्रकाशित किहिन, जेकर शीर्षक रहा सोज-ए-वतन । बाद मा प्रतिबंधित कीन गा संग्रह मा चार कहानी रहीं जवन भारतीयन का राजनीतिक स्वतंत्रता के संघर्ष मा प्रेरित करै के कोशिश करत रहीं। [११]

प्रेमचंद नाम अपनाबु

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सन १९०९ मा प्रेमचंद कै स्थानांतरण महोबा होइगा अउर बाद मा हमीरपुर मा स्कूलन के सब-डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पै लगावा गा। यहि समय के आसपास, सोज-ए-वतान का ब्रिटिश सरकार के अधिकारियन द्वारा देखल गै रहा, जे एकरा विद्रोही काम के रूप मा प्रतिबंधित कइ दिहिन। हमीरपुर जिला के ब्रिटिश कलेक्टर जेम्स सैमुअल स्टीवनसन ने प्रेमचंद के घर पर छापामारी का आदेश दिया, जहां सोज-ए-वतन के लगभग पाँच सौ प्रतियां जला दी गईं। [१२] यहिके बाद उर्दू पत्रिका जमाना के संपादक मुंशी दया नारायण निगम, जे धनपत राय के पहिली कहानी " दुनिया का सबसे अनमोल रतन" छपवाये रहे, "प्रेमचंद" छद्म नाम के सलाह दिहिन। धनपत राय "नवाब राय" नाम लेब बन्द कइकै प्रेमचंद बनि गये।

प्रेमचंद का अक्सर मुंशी प्रेमचंद के नाम से जाना जात रहा। बात ई है कि वै कन्हैयालाल मुंशी के साथे हंस पत्रिका कै संपादन किहिन। क्रेडिट लाइन मा लिखा रहा "मुंशी, प्रेमचंद"। तब से उनका मुंशी प्रेमचंद कहा जाय लाग। [ <span title="This claim needs references to reliable sources. (November 2023)">citation needed</span> ] 1914 मा, प्रेमचंद हिंदी मा लिखै लाग ( हिंदी अऊर उर्दू का एक भाषा हिंदुस्तानी के अलग-अलग रजिस्टर माना जात है, जेहिमा हिंदी आपन बहुत शब्दावली संस्कृत से लेत है अऊर उर्दू फारसी से अधिक प्रभावित है)। यहि समय तक, उ उर्दू मा एक कथा लेखक के रूप मा पहिले से ही प्रतिष्ठित होइ चुका रहा। [] सुमित सरकार नोट करत हैं कि उर्दू मा प्रकाशक ढूंढै के कठिनाई से स्विच प्रेरित कीन गा रहा। [१३] उनकर पहिली हिन्दी कहानी "सौत" दिसम्बर 1915 मा सरस्वती पत्रिका मा प्रकाशित भै, अउर उनकर पहिला लघुकथा संग्रह सप्त सरोज जून 1917 मा प्रकाशित भा।

मुंशी प्रेमचंद जी 1916 से 1921 तक गोरखपुर मा जहाँ रहत रहें, वहि झोपड़ी मा एक पट्टिका।

अगस्त 1916 मा पदोन्नति पै प्रेमचन्द कै स्थानांतरण गोरखपुर कै दीन गा। उ गोरखपुर के नॉर्मल हाई स्कूल मा सहायक मास्टर बनिन। [१४]

गोरखपुर मा, ओनके किताब बेचै वाले बुद्धि लाल से दोस्ती होइ गै, जे ओनका स्कूल मा परीक्षा क्रैम किताबन के बेचे के बदले मा पढ़ै के लिए उपन्यास उधार लेय के अनुमति दिहिन। प्रेमचंद अन्य भाषाओं के क्लासिक्स के उत्साही पाठक रहे अऊर इनमा से कईयो रचनाओं का हिंदी मा अनुवाद किहिन।

सन १९१९ तक प्रेमचंद जी लगभग सौ-सौ पन्नन के चार उपन्यास प्रकाशित कइ चुके रहैं। सन १९१९ मा प्रेमचंद कै पहिला प्रमुख उपन्यास सेवा सदन हिन्दी मा प्रकाशित भा। ई उपन्यास मूल रूप से बाजार-ए-हुसन शीर्षक से उर्दू मा लिखा गा रहा लेकिन कलकत्ता स्थित एक प्रकाशक द्वारा सबसे पहिले हिंदी मा प्रकाशित कीन गा रहा, जे प्रेमचंद का उनके काम के लिए ₹450 पेशकश किहिन। लाहौर के उर्दू प्रकाशक ने बाद मा 1924 मा प्रेमचंद का ₹250 भुगतान कइके ई उपन्यास प्रकाशित किहिन। उपन्यास एक दुखी गृहिणी के कहानी बतावत है, जे पहिले एक दरबारी बन जात है, अऊर फिर दरबारी के जवान बिटियन के लिए एक अनाथालय का प्रबंधन करत है। ई आलोचकन द्वारा बहुत पसंद कीन गा अऊर प्रेमचंद का व्यापक पहचान पावै मा मदद मिली।

1919 मा प्रेमचंद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए डिग्री प्राप्त किहिन। 1921 तक, उनका स्कूलन के उप निरीक्षक के रूप मा पदोन्नत कीन गा रहा। फरवरी 1921 का, उ गोरखपुर मा एक बैठक मा शामिल भए, जहां महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन के हिस्से के रूप मा लोगन से सरकारी नौकरियन से इस्तीफा देय का कहिन। प्रेमचंद, हालांकि शारीरिक रूप से अस्वस्थ रहे अऊर उनके पास दुई बच्चा अऊर एक गर्भवती पत्नी का समर्थन करै के लिए रहा, पांच दिन तक यहिके बारे मा सोचा अऊर अपनी पत्नी के सहमति से अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा देय का फैसला किहिन।

नौकरी छोड़ै के बाद प्रेमचंद 18 मार्च 1921 का गोरखपुर से बनारस चले गें अऊर अपने साहित्यिक जीवन पर ध्यान केंद्रित करै का फैसला किहिन। 1936 मा अपनी मृत्यु तक, उनका गंभीर वित्तीय कठिनाइयन अऊर पुरानी बीमारी का सामना करै का पड़ा। [१५]

सन १९२३ मा बनारस मा यक छपाई औ प्रकाशन घर कै स्थापना किहिन जेहकै नाँव "सरस्वती प्रेस" रखिन। [१६] सन 1924 मा प्रेमचंद के रंगभूमि का प्रकाशन भा, जेहिमा सूरदास नामक एक अंधा भिखारी दुखद नायक है। शुल्ज़ उल्लेख करत हैं कि रंगभूमि मा, प्रेमचंद एक "शानदार सामाजिक इतिहासकार" के रूप मा आवत हैं, अऊर यद्यपि उपन्यास मा कुछ "संरचनात्मक खामी" अऊर "बहुत सारा लेखकीय स्पष्टीकरण" हैं, ई प्रेमचंद के लेखन शैली मा "चिह्नित प्रगति" देखावत है। शुल्ज़ के अनुसार, ई निर्मला (1925) अऊर प्रतिज्ञा (1927) मा रहा कि प्रेमचंद का "एक संतुलित, यथार्थवादी स्तर" तक आपन रास्ता मिला जवन ओनके पहिले के कामन का पार करत है अऊर "अपने पाठकन का संरक्षण मा रखै" का प्रबंधन करत है। निर्मला, भारत मा दहेज प्रणाली से संबंधित एक उपन्यास, एक उपन्यास के रूप मा प्रकाशित होए से पहिले नवंबर 1925 अऊर नवंबर 1926 के बीच चंद पत्रिका मा क्रमबद्ध कीन गा रहा। प्रतिज्ञा ("प्रतिज्ञा") विधवा पुनर्विवाह के विषय से निपटत रही।

१९२८ मा मध्यम वर्ग के लालच पर केंद्रित प्रेमचंद कै उपन्यास गबन ("गबन" छपा। मार्च 1930 मा, प्रेमचंद हंस शीर्षक से एक साहित्यिक-राजनीतिक साप्ताहिक पत्रिका शुरू किहिन, जेकर उद्देश्य भारतीयन का ब्रिटिश शासन के खिलाफ जुटावै के लिए प्रेरित करब रहा। अपने राजनीतिक रूप से भड़काऊ विचारन के लिए विख्यात पत्रिका मुनाफा कमाए में विफल रही। फिर प्रेमचंद ने काम संभाला अऊर जागरण नामक एक अउर पत्रिका का संपादन किहिन, जवन भी घाटे मा चलत रही।

1931 मा प्रेमचंद मारवाड़ी कालेज मा अध्यापक के रूप मा कानपुर चले गें पै कालेज प्रशासन से मतभेद होय के कारन छोड़ै का पड़ा। [१०] तब उ बनारस लौटि आए अऊर मर्यादा पत्रिका के संपादक बनिन। 1932 मा, उ कर्मभूमि शीर्षक से एक अउर उपन्यास प्रकाशित किहिन। उ संक्षेप मा काशी विद्यापीठ, एक स्थानीय स्कूल के हेडमास्टर के रूप मा काम किहिन। स्कूल बंद होय के बाद, उ लखनऊ मा माधुरी पत्रिका के संपादक बने। [१०]

प्रेमचंद 31 मई 1934 का हिंदी फिल्म उद्योग मा आपन किस्मत आजमावै बम्बई पहुँचे। उ प्रोडक्शन हाउस अजंता सिनेटोन के लिए पटकथा लेखन के नौकरी स्वीकार किहिन रहैं, ई उम्मीद मा कि ₹8,000 के सालाना वेतन से ओनके वित्तीय परेशानियन का दूर करै मा मदद मिली। उ दादर मा रहे, अऊर फिल्म मजदूर ("द लेबरर") के पटकथा लिखिन। मोहन भवानानी के निर्देशन मा बनी ई फिलिम मा मजदूर वर्ग के खराब हालात का देखावा गा रहा। फिल्म मा मजदूरन के नेता के रूप मा खुद प्रेमचंद कैमियो किहिन। कुछ प्रभावशाली व्यापारी बम्बई मा एकर रिलीज पर रोक लगावै मा कामयाब रहे। ई फिलिम लाहौर अउर दिल्ली मा रिलीज भै लेकिन मिल के मजदूरन का मालिकन के खिलाफ खड़ा होय के प्रेरणा देय के बाद फिर से प्रतिबंधित कीन गा।

विडंबना ई है कि ई फिलिम बनारस मा अपने घाटे वाले प्रेस के मजदूरन का वेतन न मिलै के बाद हड़ताल करै के लिए प्रेरित किहिस। 1934–35 तक, प्रेमचंद के सरस्वती प्रेस ₹400 के भारी कर्ज मा रहा, अऊर प्रेमचंद का जागरण के प्रकाशन बंद करै का मजबूर कीन गा रहा। इसी बीच प्रेमचंद बम्बई फिल्म उद्योग के गैर-साहित्यिक व्यावसायिक माहौल का नापसंद करै लाग रहे, अउर बनारस लौटै चाहत रहे। हालांकि, उ प्रोडक्शन हाउस के साथे एक साल के अनुबंध पर हस्ताक्षर किहिन रहैं। एक साल पूरा होय से पहिले, उ अंततः 4 अप्रैल 1935 का बम्बई छोड़ दिहिन। बम्बई टॉकीज़ के संस्थापक हिमांशु रॉय प्रेमचंद का वापस रहै के लिए मनावै के कोशिश किहिन लेकिन असफल रहे। आखिरी दिन बम्बई छ्वाड़ै के बाद, प्रेमचंद इलाहाबाद मा बसब चहति रहैं, जहाँ उनके लरिका श्रीपत राय अउर अमृत कुमार राय पढ़ति रहैं। उइ हुँवा ते हंस का प्रकाशित करै के योजना बनाइन। हालांकि, अपनि वित्तीय स्थिति द्याखत भए अऊर बीमार स्वास्थ्य के कारण, उनका हंस का इंडियन लिटरेरी काउंसल के हवाले करै का पड़ा अउर बनारस जाय का पड़ा।

प्रेमचंद का 1936 मा लखनऊ मा प्रगतिशील लेखक संघ क्या पहिला अध्यक्ष चुना गा रहै [१६] 8 अक्टूबर 1936 का कइयो दिनन की बीमारी के बाद पद पर रहतै रहत उनक्या निधन होइ गा।

गोदान ( द गिफ्ट ऑफ ए काउ, 1936), प्रेमचंद क्यार आखिरी पूरा कीन गा काम है, आम तौर पर यहिका उनके सबते श्रेष्ठ उपन्यास के रूप मा स्वीकार कीन जात है अउर सबते अच्छे हिंदी उपन्यासननौ मा गिना जात है। [१७] येहिका नायक, होरी, एक गरीब किसान, ग्रामीण भारत मा धन अउर प्रतिष्ठा के प्रतीक गाय के लिए तरसत देखावा गा है। सिगफ्राइड शुल्ज़ के अनुसार, " गोदान एक सुव्यवस्थित अउर सुसंतुलित उपन्यास है जउन पश्चिमी साहित्यिक मानक द्वारा स्थापित साहित्यिक आवश्यकतन का पर्याप्त रूप ते पूरा करत है।" रवीन्द्रनाथ टैगोर जइसे अन्य समकालीन प्रसिद्ध लेखकन के विपरीत, प्रेमचंद के भारत ते बाहर बहुत सराहना नहीं कीन गै। शुल्ज़ का मानबु है कि यहिके कारण उनके काम के अच्छे अनुवादन क अभाव है। साथै, टैगोर अउर इकबाल के विपरीत, प्रेमचंद कबो भारत ते बाहर नहीं गें, विदेश मा पढ़ाई नहीं कीन्हेनि या प्रसिद्ध विदेशी साहित्यिक हस्तिन के साथै मिलैजुलै नहीं गें।

1936 मा प्रेमचंद जी "कफन" (" कफन ") नामक कहानी प्रकाशित कीन्हेनि, जेहिमा एक गरीब मनई अपनी मरी मेहेरिया के अंतिम संस्कार के खातिर पइसा इकट्ठा करत है लेकिन सब पइसा खावै पिएम उड़ा देत है। प्रेमचंदजी के आखिरी प्रकाशित कहानी "क्रिकेट मैच" रहै, जउन उनके मरै के बाद 1938 मा जमाना मा छपी रहै।

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