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रमई काका

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चंद्र भूषण त्रिवेदी
जनम०२ फरवरी १९१५
रावतपुर, उन्नाव जिला, उत्तर प्रदेश
निधन१८ अप्रैल १९८२
लखनऊ, भारत
उपनाँवरमई काका
पेशालेखक, कवि अउर रंगकर्मी
प्रमुख रचनाकुलभिनसार,बौछार,फुहार,गुलछर्रा,नेताजी, बहिरे बाबा और वरखोज ।

रमई काका अवधी भाषा के एक कवि रहैं। अवधी के आधुनिक कबिन मा सबते पापुलर कवि, रमई काका, का जनम रावतपुर, उन्नाव जिला (अवध) मा दुइ फरवरी सन्‌ १९२५ क भा रहै। काका जी का पूरा नाव रहै चंद्रभूषण त्रिवेदी। काका की कबिताई मा व्यंग्य के छटा जनता की जबान पर चढ़ि के ब्वालति रहै। आजौ उनकी कविता क्या वहै असर बरकरार है। १९४० ते काका जी आकासबानी मा काम करै लाग अउर तब ते काका जी के ख्याति बढ़तै गै। आकासबानी लखनऊ ते प्रकाशित काका जी क प्रोग्राम ‘बहिरे बाबा’ बहुतै सराहा गा। काका जी के कार्यक्रम कै प्रस्तुति बी.बी.सी. लंदन ते होइ चुकी है। इनकी कबिता चौपाल मा, किसानन के खेतन मा, मेलन मा, चौराहन पै सहजै मिलि जात है। ‘भिनसार’, ‘बौछार’, ‘फुहार’, ‘गुलछर्रा’, ‘नेताजी’ जैसे कयिउ काब्य-संग्रह हजारन की संख्या मा छपे अउर बिके। दूर-दूर तक अपनी लोक-भासा क जस फैलाय के माटी क यो सपूत अठारह अपरैल सन्‌ १९८२ क दुनिया छाँड़ि दीन्हेसि।

  • ‘भिनसार’,
  • ‘बौछार’,
  • ‘फुहार’,
  • ‘गुलछर्रा’,
  • ‘नेताजी’

उनके एक कविता क नमूना

[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करैं]

हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा!
 [१]
हम गयन याक दिन लखनउवै, कक्कू संजोगु अइस परिगा।
पहिलेहे पहिल हम सहरु दीख, सो कहूँ–कहूँ ध्वाखा होइगा—
जब गएँ नुमाइस द्याखै हम, जंह कक्कू भारी रहै भीर।
दुई तोला चारि रुपइया कै, हम बेसहा सोने कै जंजीर॥
लखि भईं घरैतिन गलगल बहु, मुल चारि दिनन मा रंग बदला।
उन कहा कि पीतरि लै आयौ, हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा॥
 [२]
म्वाछन का कीन्हें सफाचट्ट, मुंह पौडर औ सिर केस बड़े।
तहमद पहिरे कम्बल ओढ़े, बाबू जी याकै रहैं खड़े॥
हम कहा मेम साहेब सलाम, उई बोले चुप बे डैमफूल।
'मैं मेम नहीं हूँ साहेब हूँ' , हम कहा फिरिउ ध्वाखा होइगा॥
 [३]
हम गयन अमीनाबादै जब, कुछ कपड़ा लेय बजाजा मा।
माटी कै सुघर महरिया असि, जंह खड़ी रहै दरवाजा मा॥
समझा दूकान कै यह मलकिन सो भाव ताव पूछै लागेन।
याकै बोले यह मूरति है, हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा॥
 [४]
धँसि गयन दुकानैं दीख जहाँ, मेहरेऊ याकै रहैं खड़ी।
मुंहु पौडर पोते उजर–उजर, औ पहिरे सारी सुघर बड़ी॥
हम जाना मूरति माटी कै, सो सारी पर जब हाथ धरा।
उइ झझकि भकुरि खउख्वाय उठीं, हम कहा फिरिव ध्वाखा होइगा॥